रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमस्तरङ्गः २२३ भा.टी.—नागाभ्रक का सेवन करने से भयंकर भगन्दर रोग उत्पन्न होता है और मण्डल कुष्ठ या महाकुष्ठ ( गलितकुष्ठ ) अथवा दोनों ही प्रकार के कुष्ठ उत्पन्न होते हैं ॥ ८ ॥ मण्डूकाभ्रस्य लक्षणम् अग्नौ सन्तापितं यत्तु भेकवत्कुरुते रवम् । उत्प्लुत्योत्प्लुत्य च पतेन्मण्डूकं तदिहोच्यते ॥६॥ भा.टी.—जो अभ्रक अग्नि में तपाने पर मेढक के समान शब्द करता है और चिटक चिटक कर बिखरने लगता है उसे मण्डूकाभ्रक कहते हैं ॥ ६ ॥ तस्य दोषाः मण्डूकसंज्ञकं त्वभ्रं सततं परिशीलितम् । अश्मरीं जनयत्याशु शस्त्रसाध्यमसंशयम् ॥१०॥ कृष्णाभ्रकस्यैव चत्वारो भेदाः पिनाकादयः । तेषां लक्षणानि दोषाश्च व्याख्याताः ॥ १० ॥ भा.टी.—मण्डूकाभ्रक का कुछ काल निरन्तर सेवन करने से निश्चित ही शस्त्रसाध्य भयंकर अश्मरी रोग हो जाता है ऐसा लिखा है ॥ १० ॥ वज्राभ्रकस्य लक्षणम् पावकोत्तापितं यत्तु विकृतिं नैव गच्छति । तिष्ठत्यग्नौ भिदुरवत् वज्राभ्रं तत्प्रकीर्तितम् ॥११॥ वज्राभ्रकलक्षणम्—भिदुरवत् वज्रवत् ॥ ११ ॥ भा.टी.—जो अभ्रक अग्नि में तपाने पर किसी प्रकार भी विकृत नहीं होता और वज्र के समान तद्रूप बना रहता है उसे वज्राभ्रक कहते हैं ॥ ११ ॥ तस्य गुणाः सर्वश्रेष्ठं तु वज्राभ्रं महाव्याधिहरं परम् । देहसिद्धिकरञ्चापि जरावैरूप्यनाशनम् ॥१२॥ भा.टी.—वज्राभ्रक सब अभ्रकों में श्रेष्ठ होता है । इसके सेवन से महा रोग नष्ट हो जाते हैं । यह शरीर को सर्वगुणसंपन्न करता है तथा इसके प्रयोग से बुढ़ापे से आने वाली कुरूपता भी नष्ट हो जाती है ॥ १२ ॥ जात्याभ्रकस्य स्वरूपम् नीलाञ्जनोपमं स्निग्धं भारपूर्णं महोज्ज्वलम् । निर्मोच्यपत्रं मृदुलं त्वभ्रं श्रेष्ठमिहोच्यते ॥१३॥