भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२५ दशमस्तरङ्गः २२५ अभ्रकशोधनस्य प्रथमः प्रकारः वह्नौ सन्ताप्य गगनं काञ्जिके निक्षिपेद् बुधः । सप्तवारं प्रयत्नेन ततः खल्वे निधापयेत् ॥१८॥ अम्लेन केनचिद्वापि सुदृढं पेषयेत्ततः । एवं दिनैकं संपिष्टं त्वभ्रकं शुद्धिमाप्नुयात् ॥१९॥ भा.टी.—पूर्वोक्त प्रकार से सद्गुणयुक्त वज्राभ्रक लेकर उसको अग्नि में तपा- कर सात बार काञ्जी में बुझावें । इसके अनन्तर खरल में डाल किसी अम्लद्रव से खूब अच्छी तरह से एक दिनतक मर्दन करने से अभ्रक शुद्ध हो जाता है ॥१८-१९॥ वक्तव्य—काञ्जी में बुझाने पर अभ्रक के पत्र अलग-अलग हो जाने पर उनको इकट्ठा करके फिर किसी पतले टीन में रख तपायें तो सुभीता रहता है । इस तरह सात बार बुझाने से पत्रों के बीच में होनेवाली वालुका तथा मिट्टी या पत्थर सब नीचे काञ्जी में रह जाते हैं । द्वितीयः शोधनप्रकारः अभ्रकं वह्निसन्तप्तं सप्तवारं निषेचितम् । गोदुग्धे वा वराक्वाथे शुद्धिमायात्यनुत्तमम् ॥२०॥ भा.टी.—अभ्रक को अग्नि में खूब गरम करके सात बार गोदुग्ध अथवा त्रिफलांकषाय में बुझाने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ २० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः अभ्रकं दहनोत्तप्तं सप्तवारं निषेचितम् । बदरीकथिते पश्चात् पेषितं शुद्धिमाप्नुयात् ॥२१॥ धान्याभ्रकमकृत्वैव घनमेवं विशोधितम् । मारणार्थं प्रयुञ्जीत रसतन्त्रविचक्षणः ॥२२॥ तृतीये शोधनप्रकारे अग्नितप्तं कृत्वा सप्तवारं बदरीक्वाथे निर्वापयेत् । धान्या- भ्रकमकृत्वैवेति तु गुणातिशयदर्शनार्थम् । तथा चोक्तम्—“अथवा बदरीक्वाथे ध्मातमभ्रं विनिक्षिपेत् । मर्दितं पाणिना शुष्कं धान्याभ्रादतिरिच्यते ॥” इति । वस्तुतस्तु धान्याभ्रकरणं पाषाणांशनिरासाय मर्दनयोग्यतासम्पादनाय चेति ॥२१-२२ भा.टी.—अभ्रक को अग्नि में तपाकर सात बार बेर के पत्तों और छाल के कषाय में बुझाकर अन्त में पीस लें तो यह शुद्ध हो जाता है । इस विधि से शोधित अभ्रक को बिना धान्याभ्रक बनाये ही भस्म किया जाय तो कोई हानि नहीं होती है ॥ २१-२२ ॥