रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२६ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—धान्याभ्रक बनाने से वह सूक्ष्म कणों में विभक्त हो जाता है और उसमें पत्थर बालू आदि का कोई अंश नहीं रहता । अतः धान्याभ्रक कर लेना अधिक गुणदायक होता है । चतुर्थः शोधनप्रकारः अभ्रकं वह्निसन्तप्तं गव्ये पयसि निक्षिपेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन लुङ्गाम्लगणेन तु ॥२३॥ पेषयेदथ तन्त्रज्ञस्तण्डुलीयद्रवेण च । एवं दिनत्रयेणैव त्वभ्रं शुद्धिमुपैत्यलम् ॥२४॥ भा.टी.—अभ्रक को अग्नि में तपा-तपा कर गाय के दूध में सात बार बुझा लें । अब इसके कंकड़ बालुका-रहित पात्रों को बिजौरानींबू आदि किसी अम्लद्रव के साथ एक दिन और चौलाई के स्वरस के साथ एक दिन तक अच्छी तरह मर्दन करें । इस तरह तीन दिन में वह शुद्ध हो जाता है ॥ २३–२४ ॥ धान्याभ्रकस्वरूपम् अभ्रं कम्बलमध्यस्थं सधान्यं परिमर्दनात् । धान्येभ्यो निर्गतं यस्मात्तस्माद्धान्याभ्रमुच्यते ॥२५॥ भा.टी.—अभ्रक के मोटे चूर्ण को धानों के साथ कम्बल में बाँधकर मर्दन करने से धानों की रगड़ से चूर्णारूप में होकर अभ्रक कम्बल के छिद्रों से बाहर निकलता है । अतः इसको धान्याभ्रक कहते हैं ॥ २५ ॥ धान्याभ्रकस्य निर्माणप्रकारः पादांशधान्यसंयुक्तं गगनं कम्बलोदरे । निक्षिप्य रोधयेत्सम्यक् मुखं सूत्रेण बुद्धिमान् ॥२६॥ दिनैकं स्थापयेन्नीरे क्लिन्नतां याति तद्यथा । सुक्लिन्नञ्चाथ यत्नेन पाणिभ्यां मर्दयेद् दृढम् ॥२७॥ तस्मिन्नेव जले त्वभ्रं यथा सर्वं परिस्रवेत् । संशोष्य चाथ सलिलं पुटयोगेन मारयेत् ॥२८॥ धान्याभ्रलक्षणं प्रकारश्च व्याख्यातः ॥ २६–२८ ॥ भा.टी.—एक कम्बल में अभ्रक एक भाग और धान चौथाई भाग रखकर इसको अच्छी तरह सूत्र या डोरी से बाँधकर एक दिन तक इस पोटली को पानी में डाल दें जिससे यह कुछ गीला हो जाय । गीला होने पर हाथों से इस पोटली को उसी पानी में रगड़ें जिससे सारा अभ्रक पानी में आ जाय । अब इस पानी