रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 269, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशमस्तरङ्गः २२७ को सुखाकर अभ्रक को भस्म करने के लिये पुट में पकावें ॥ २६-२८ ॥ अभ्रकमारणे पुटसंख्यानियमः विंशत्यादिः शतान्तस्तु पुटो रोगनिवृत्तये । शतादिस्तु सहस्रान्तः प्रशस्तश्च रसायने ॥ २६ ॥ पुटसंख्यानियमः गुणव्यवस्थाहेतुः। विंशत्यादिरिति-एतेन दशपुटैकपुटितादि- मारणप्रकाराणां जघन्यता सूचिता । तस्मादुपेक्षितप्रायोऽयं मार्ग आचाय्यैः ॥ ६ ॥ भा.टी. - साधारण रोगों के नष्ट करने के लिये अभ्रकभस्म बनानी हो तो उसे बीस से लेकर सौ तक पुट देने चाहिये । किन्तु रसायन के रूप में सेवन करने के लिये इसे सौ से लेकर हजार तक पुट देने चाहिये ॥ २६ ॥ अभ्रकस्य प्रथमो मारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय कासमर्दभवैर्द्रवैः । दिनैकं पेषयित्वाथ चक्रिकाकारतां नयेत् ॥ ३० ॥ ततो गजपुटं दद्यात् दशवारं विधानतः । रविक्षीरैस्ततो दद्यात्तद्वदेव पुटानि तु ॥ ३१ ॥ एवं तु विंशतिपुटैरेवाभ्रस्य मृतर्भवेत् । सिन्दूरसदृशं भस्म जायते नात्र संशयः ॥३२॥ तत्रायं तावत् प्रथमो गगनमारणप्रकारः - कासमर्दरसैर्दश पुटानि अर्क- दुग्धैश्च ततो दशेति विंशतिपुटानि । स्पष्टमन्यत् ॥ ३०-३२ ॥ भा.टी. - धान्याभ्रक को कसौंजी के स्वरस या क्वाथ में एक दिन तक मर्दन कर उसकी टिकिया बना सुखा करके सम्पुट में बन्द करें और गजपुट में फूँक दें । इस प्रकार दस पुट कसौंजी के स्वरस से दें । इसके अनन्तर उसी विधि से आक के दूध में भी दशपुट दें तो बीस पुटों में अभ्रक की रससिन्दूर के सदृश लाल भस्म बन जाती है ॥३०-३२ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय नागिनीदलजैर्द्रवैः । तद्वद्भासारसेनापि मीनाक्ष्याः स्वरसेन च ॥ ३३ ॥ न्यग्रोधपयसा चापि तद्वदेव पुटेद्भिषक् । एवं विंशतिवारेण गगनं पञ्चतां व्रजेत् ॥ ३४ ॥ अपरः प्रकारः-नागिनीदलादीनां चतुर्णां द्रव्याणां रसैः प्रत्येकं पञ्चपुटानि, एवं विंशतिपुटानि । नागिनीदलं ताम्बूलपत्रम् ॥ ३३, ३४ ॥