रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—धान्याभ्रक को लेकर उसे पान के पत्तों के रस में मर्दन कर कम से कम पाँच गजपुट दें । इसी तरह वासास्वरस, मछेछों तथा बड़ के दूध की क्रमशः पाँच-पाँच पुट देवें। इस प्रकार भी बीस पुट देने से अभ्रकभस्म हो जाता है ॥ ३३, ३४ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय तण्डुलीयोद्भवैर्द्रवैः । दिनत्रयं पेषयित्वा ततश्च कृतचक्रिकम् ॥३५॥ पुटेद् गजपुटेनैव दशवारं प्रयत्नतः । ततः पुनर्नवानीरैस्तद्वदेव पुटेद्भिषक् ॥ ३ ॥ वटशुङ्गकषायेण तद्वदेव पुटेत्तथा । एवं त्रिंशत्पुटैरेव गगनस्य मृतिर्भवेत् ॥ ३७ ॥ तण्डुलीयादिमिस्त्रिभिर्द्रव्यैः प्रत्येकं दशधा पुटनात्त्रिंशद्भिः पुटैरपरः प्रकारः ॥ ३५-३७ ॥ भा.टी.—धान्याभ्रक को चौलाई के स्वरस में तीन दिन तक अच्छी तरह मर्दन करके टिकिया बनाकर गजपुट में फूँक दें । इस विधि से दस पुट दें । इसके बाद पुनर्नवास्वरस की दस पुट दें । अन्त में बड़ के कोपलों के स्वरस की दस पुट दें तो तीस पुटों में अभ्रक की भस्म हो जाती है ॥ ३५-३७ ॥ चतुर्थो मारणप्रकारः धान्याभ्रं पञ्चवारं प्रथममिह पुटेन्मुस्तकक्वाथयोगात् रम्भानीरेण तद्वत्तदनु च सलिलैस्तण्डुलीयप्रसूतेः । भृङ्गोत्थेनापि वारां तदनु खलु वरानीरपूरेण पिष्ट्वा दत्त्वा गन्धञ्च तुल्यं सकृदिह पुटितो वारिदो याति मृत्युम्॥३८॥ मुस्तकादिभिः पञ्चभिः प्रत्येकं पञ्चधा पुटनात् पञ्चविंशतिपुटानि । गन्धक- योगादेकमिति षड्विंशतिभिः पुटैश्चतुर्थः ॥ ३८ ॥ भा.टी.—धान्याभ्रक को पहिले मोथे के कषाय की पाँच गजपुट दें, इसके अनन्तर कदलीकन्दस्वरस की पाँच पुट, फिर चौलाईस्वरस की पाँच पुट, फिर भृङ्गराजस्वरस की पाँच पुट देकर, अन्त में त्रिफलाकषाय की पाँच पुट देकर सप्रसं अन्त में अभ्रक के समभाग शुद्ध गन्धक मिला एक पुट देनेसे अभ्रक की भस्म हो जाती है ॥ ३८ ॥ पञ्चमो मारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय रविक्षीरैर्विमर्द्दयेत् ।