रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमस्तरङ्गः २२६ रविमूलद्रवैर्वापि दिनमेकं निरन्तरम् ॥३६॥ ततः संशोषयेद् घर्मे गगनं कृतचक्रिकम् । रविपत्रैश्च संवेष्ट्य सप्तवारं विधानतः ॥ ४० ॥ पुटेद् गजपुटेनैव रसतन्त्रविशारदः । ततो न्यग्रोधमूलोत्थैः क्वाथैर्दद्यात्पुटत्रयम् ॥ ४१ ॥ तद्वद्रम्भारसेनापि सप्तवारं पुटेद्भिषक् । एवं स्वल्पैः पुटैरेव गगनं मृतिमाप्नुयात् ॥ ४२ ॥ पञ्चमो मारणप्रकारः—सप्तदशपुटयोगात् सुगमः ॥ ३६–४२ ॥ भा.टी.—धान्याभ्रक को एक दिन आक के दूध के साथ या आक की जड़ के रस के साथ अच्छी तरह मर्दन कर टिकिया बनाकर धूप में अच्छी तरह सुखा लें । अब इन टिकियों को आक के पत्तों में लपेटकर सूत्र से बाँधकर गजपुट में फूँक दें, इस विधि से सात गजपुट दें । इसके बाद बड़ की जड़ के स्वरस की तीन पुट और अन्त में कदलीकन्द स्वरस की सात गजपुट दें तो अभ्रक की शीघ्र ही भस्म हो जाती है ॥ ३६–४२ ॥ षष्ठो मारणप्रकारः क्षीरत्रयं काकमाची गोक्षुरः खरमञ्जरी । वटप्ररोहो गोमूत्रं तुलसी कदलीशिफा ॥ ४३ ॥ एभिरभ्रं विमर्द्याथ दशवारं पृथक् पृथक् । पुटेत्पुटविधानज्ञः क्रमेणेत्र भिषग्वरः ॥ ४४ ॥ शतधा पुटनादेवं रक्तोत्पलसमप्रभम् । निश्चन्द्रं जायते भस्म सर्वदोषविर्जितम् ॥ ४५ ॥ क्षीरत्रयं रविशीरं वटक्षीरं स्नुहीक्षीरमिति प्रागुक्तम् । खरमञ्जरी अपामार्गः । कदलीशिफा रम्भामूलम् । एवं दशद्रव्यैर्दशधा पुटनात् शतं पुटानि ॥४३–४५॥ भा.टी.—आक का दूध, बड़ का दूध और थोहर का दूध, मकोय, गोखरू, अपामार्ग, बड़ की कोंपल, गोमूत्र, तुलसी, कदलीकन्द, इन दस औषधियों के साथ पृथक्-पृथक् मर्दन करके टिकिया बना संपुट में बन्द करके दस पुट देने से एक सौ पुटों में अभ्रक की रक्तकमलवर्ण, निश्चन्द्र तथा सर्वदोषरहित भस्म हो जाती है ॥ ४३–४५ ॥ सप्तमोमारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय वत्स्वंशगुडसंयुतम् ।