रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० रसतर्ङ्गिणी वर्धमानदलद्रावैर्मर्दयित्वा द्वियामकम् ॥ ४६ ॥ वेष्टयेद् वटपत्रैश्च गगनं कृतचक्रिकम् । ततः कार्पाससूत्रेण पत्रप्रान्तेषु रोधयेत् ॥ ४७ ॥ ततो गजपुटं दद्याद्दशवारं विधानतः । निश्चन्द्रिकं भवेद् भस्म गगनस्य न संशयः ॥ ४८ ॥ अष्टमांशगुडक्षेपाद् एरण्डपत्ररसैर्मर्दनाद् दशपुटैरेव मारणमभ्रस्य भवतीति निःसंशयं वचनम् ॥ ४६-४८ ॥ भा.टी.—धान्याभ्रक में उसके आठवाँ भाग गुड़ डालकर इसको एरण्ड- पत्रस्वरस से अच्छी तरहसे ६ घण्टे तक मर्दन करके इसकी मोटी-मोटी टिकियाँ बना लें। अब इन टिकियाओं को बड़ के पत्तों से अच्छी तरह लपेट दें और सम्पुट में बन्दकर गजपुट में फूँक दें। इस विधि से दश ही पुटों में अभ्रक की निश्चन्द्र भस्म हो जाती है ॥ ४६-४८ ॥ अष्टमो मारणप्रकारः धान्याभ्रकं समादाय मूलिकाया द्रवैर्दृढम् । पेषयेद्दिनमेकन्तु द्विदिनं वा भिषग्वरः ॥ ४९ ॥ वेष्टयेद्वटपत्रैश्च गगनं कृतचक्रिकम् । एकविंशतिवाराणि पुटेदेवं प्रयत्नतः ॥ ५० ॥ निश्चन्द्रिकं भवेद्भस्म निर्विकारं गुणोत्तमम् । एवं मृतं तु गगनं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ ५१ ॥ भा.टी.—धान्याभ्रक को एक या दो दिन तक मूली के रस से घोटकर मोटी टिकिया बनाकर सुखाकर बड़ के पत्तों से लपेटकर गजपुट में फूँक दें। इस प्रकार इक्कीस पुट देने से अभ्रक की उत्तम गुण करनेवाली निश्चंद्र (चमक- रहित ) तथा विकार-रहित भस्म हो जाती है। इसको योगों में बिना सन्देह के प्रयोग कर सकते हैं ॥ ४९-५१ ॥ नवमो मारणप्रकारः वटप्ररोहक्वाथेन धान्याभ्रं परिपेषितम् । एरण्डपत्रैरावेष्ट्य पुटयेत्कृतचक्रिकम् ॥ ५२ ॥ दशवारं पुटित्वैवं पुटेत्क्षुद्राकषायतः । वासया कलिवृक्षस्य क्वाथेन च तथा पुटेत् ॥ ५३ ॥ चत्वारिंशत्पुटैरेवं गगनं मृतिमाप्नुयात् ।