रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिश्चन्द्रिकं भवेद्भस्म क्षयकासादिनाशनम् ॥ ५४ ॥ नवमः प्रकारो मारकद्रव्यमहिम्ना क्षयकासादिनाशनः । स्पष्टमन्यत् ।५२-५४। भा.टी. - बड़ की कोंपलों के रससे धान्याभ्रक को एक दिन तक मर्दन करके टिकिया बना एरण्डपत्रों से लपेट दें और गजपुट में फूँक दें । इस प्रकार दस गजपुट दें । इसके बाद दस पुट छोटी कटेली के कषाय की, दस पुट अडूसास्वरस और दस पुट बहेड़ाकषाय की देने से अभ्रक की निश्चन्द्र भस्म हो जाती है । यह क्षय, कास आदि में लाभदायक होती है ॥ ५२-५४ ॥ मृताभ्रकस्य लक्षणम् निश्चन्द्रञ्चारुणं स्वच्छं सुसूक्ष्मं स्पर्शकोमलम् । अभ्रं मृतं विजानीयाद्रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ५५ ॥ मृताभ्रकलक्षणे निश्चन्द्रत्वं लक्षणम् । अरुणत्वादिविशेषस्तु उत्कर्षाधान- हेतुः । तथा च आरुण्यादिगुणं भस्म उत्कृष्टम् । सचन्द्रन्तु तदप्यमृतमेवेति॥५५॥ भा.टी. - उत्तम प्रकार से बनायी हुई अभ्रकभस्म चन्द्रिकारहित होती है, उसका वर्ण लाल होता है, यह बहुत बारीक और स्पर्श में कोमल होती है । निश्चन्द्र होना इसका मुख्य लक्षण समझना चाहिये। अन्यथा यह सेवन करने पर विष के समान कार्य करती है ॥ ५५ ॥ अभ्रकस्य मारको गणः क्षीरत्रयं काकमाची मुस्ता घृतकुमारिका । वटप्ररोहो गोमूत्रं बिल्वमूलदले वृषः ॥ ५६ ॥ फलत्रिकमजारक्तं कण्टकारी कदम्बकः । अग्निमन्यः शालिपर्णी श्रीपर्णी पाटली गुडः ॥ ५७ ॥ तिलपर्णी पृश्निपर्णी गोक्षुरः खरमञ्जरी । शुक्लसिद्धार्थको लोध्रः बृहती हिलमोचिका ॥ ५८ ॥ धत्तूरः कासमर्दश्च मातुलानी गुडूचिका । मारिषस्तुलसी दूर्वा वाजिगन्धा च तिक्तका ॥ ५९ ॥ मण्डूकपर्णी मदनः पिण्डी तगरमेव च । शङ्खपुष्पी नागवल्ली घोट्टा श्वेतपुनर्नवा ॥ ६० ॥ आखुपर्णी सप्तपर्णः रम्भाकन्दरसस्तथा । भृङ्गराजो देवदारु तालमूली च मालती ॥ ६१ ॥ अगस्त्यपत्रं तालीशं चित्रकं जलकुम्भिका ।