रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० रस्तरङ्गिणी विशेषशोधनम् सत्त्वस्य गोलकं ध्मात्वा भृशं संतापयेद् बुधः । काञ्जिके चाथ निर्वाप्य लोहदण्डेन कुट्टयेत् ॥ १०४ ॥ पुनः पुनः सम्प्रताप्य यावद्यायाति चूर्णताम् । गोघृतेन त्रिधा वापि धात्रीनीरेण भर्जयेत् ॥ १०५ ॥ भर्जने भर्जने कार्यं खल्वे सत्त्वविमर्दनम् । ततः पुनर्नवानीरैः सिंहास्यस्वरसेन च ॥ १०६ ॥ काञ्जिकेनापि सम्मेल्य भृशं सम्पे नयेद्भिषक् । इत्थं विशोधितं व्योमसत्त्वं मारणसम्मतम् ॥ १०७ ॥ सिंहास्यः वासा, मारणाय सम्मतमिति विग्रहः ॥ १०४-१०७ ॥ भा.टी.—अभ्रकसत्त्व के गोले को कोयलों की अग्नि में रखकर खूब तपायें, तपने पर इसे निकाल उसी क्षण काञ्जी में बुझाकर इमामदस्ते में लोहे की मूसली से खूब कूटें और फिर भट्टी पर रखकर तपायें और काञ्जी में बुझाकर खूब कूटें जब तक कि उसका चूर्ण हो जाय । अब चूर्णरूप अभ्रक सत्व को गोघृत और आँवलों के स्वरस में डालकर तीन-तीन बार भून लें और खरल में डालकर मर्दन करते रहें, अन्त में पुनर्नवास्वरस, वासास्वरस और काञ्जी में पीसकर रख लें और भस्म करने के लिये इसको उपयुक्त समझें ॥१०४-१०७॥ अभ्रकसत्त्वस्य मारणम् विशोधितं व्योमसत्त्वं तदर्धं सूतगन्धकम् । निक्षिप्य मर्दयेत्खल्वे काचकूपीगतं ततः ॥ १०८ ॥ पचेत्तु बालुकायन्त्रे विधानज्ञो भिषग्वरः । इत्थं नातिचिरादेव खसत्त्वं याति पञ्चताम् ॥ १०६ ॥ अभ्रकसत्त्वमारणप्रकारः व्याख्यातः ॥ १०८, १०६ ॥ भा.टी.—उक्तविधि से शुद्ध अभ्रकसत्त्व एक भाग, और पारे गन्धक की समभाग कज्जली आधा भाग लेकर दोनों को एकत्र मर्दन करके कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में भरकर बालुकायन्त्र में पकावें तो इसकी शीघ्र ही भस्म हो जाती है ॥ १०८, १०६ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः द्वौ भागौ घनसत्त्वस्य भागश्च रसगन्धयोः । श्लक्ष्णपिष्टं ततः कृत्वा सप्तवारं प्रयत्नतः ॥ ११० ॥