भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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सताम्रकज्जलीयुतं तु तालकं विशोधितम् । विभाव्य निम्बवारिणा नवेन चेन्द्रवारकम् ॥७२॥ निषेवितं तु गुञ्जकं ज्वरस्य यामपूर्वकम् । निहन्ति भूतसङ्गजं ज्वरं परं सुदारुणम् ॥७३॥ नवसादरचूर्णेन तालकं परिपेषितम् । लेपेन नाशयत्येव वृश्चिकार्तिं सुदारुणाम् ॥७४॥ लवङ्गचोचकपूरसंयुक्तं शुक्रमहेहृत् । जातिपत्रीकुङ्कुमाभ्यां प्रतिश्यायं व्यपोहति ॥७५॥ अपामार्गशिखाक्षारयुतं तु हरितालकम् । प्रलिप्तं चिरसञ्जातं हन्ति लिङ्गार्शसं द्रुतम् ॥७६॥ सन्योषताम्रं तालं तु वातशूलहरं परम् । जातीफलसमायुक्तं बलवृद्धिकरं मतम् ॥७७॥ अथास्य रोगयोग्यः प्रयोगः—आम्म्रगन्धहरिद्रा आँवाहलदीत्याख्या, पञ्चतिक्तं गुडूची, निम्बमूलत्वक् , वासकः, निदिग्धिका, पटोलपत्रमित्येतदुक्तम् । ताम्बूलेन क्षयमिति—यद्यपि ताम्बूलं शोषिणामपथ्यं तथापि भेषजसंयोगप्रभावात् ज्ञेयम् । अथवा चूर्णखादिरादिवर्जितं ताम्बूलपत्रमादेयमिति विशेषः । दुर्ज्वलज्वरः वर्षासु जातो विषमज्वरः । चतुर्दशवारं नवीनेन निम्बजलेन भावना ॥ ६०–७७ ॥ भा.टी.—वासास्वरस अथवा कंटकारीस्वरस के साथ हरताल का सेवन करने से भयंकर श्वास रोग दूर हो जाता है। सब प्रकार के रक्तविकृतिजन्य रोगों के लिये हरताल को आँवाहल्दी के स्वरस के साथ सेवन कराया जाता है। अपस्मार रोग में इसको वच और जीरे के चूर्ण के साथ प्रयोग करना चाहिये। पूर्वोक्त पञ्चतिक्त द्रव्यों के कषाय के साथ सेवन करने से यह कुष्ठ रोग को नष्ट करती है। देवदालीस्वरस के साथ हरताल का सेवन करने से यह वातरक्त रोग- जन्य उपद्रवों को शांत करती है। भयंकर वीसर्प रोग के लिये बांझककोड़े के रस के साथ हरताल का सेवन करना चाहिये। त्वचा के रोगों में इसको कुमारीस्वरस के साथ सेवन करने से लाभ होता है। हरड़ के चूर्ण के साथ कुछ दिन हरताल का सेवन करने से अर्शोंरोग शीघ्र ही शांत हो जाता है। पाण्डुरोग में इसको हल्दी के रस के साथ सेवन करना चाहिये। वातरक्त रोग में इसको गिलोयसत्त्व के साथ सेवन करना चाहिये। पान के साथ इसको क्षयरोग में दिया जाता है।