भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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कुनटी कुलटी गोला नागमाता च सा मता । कल्याणिका च सैवेह कथिता रसनेत्रिका ॥ १०५ ॥ अथ मनःशिला—नैपालिका, तद्देशजातत्वात् ॥ १०४-१०५ ॥ भा.टी.—मनःशिला, रोगशिला, शिला, नैपालिका, मनोगुप्ता, मनोज्ञा, मनोहा, नागजिह्विका, कुनटी, कुलटी, गोला, नागमाता, कल्याणिका, रस- नेत्रिका; ये सब नाम मैनसिल के कहे जाते हैं ॥ १०४-१०५ ॥ शोधनोचितशिलायाः स्वरूपम् मनःशिला शिलाखण्डशून्या रक्तोत्पलप्रभा । भारे गुरुतरा दीप्ता शोधनार्हा मता बुधैः ॥ १० ॥ उत्तममनःशिलापरिचयः—दीप्ता सचकचकया, शोधनार्हा ग्राह्येत्यर्थः॥१०॥ भा.टी—शोधन के योग्य मैनसिल पत्थर-कंकड़ रहित, लाल कमल के सदृश प्रभावानी, वजन मे भारी और चमकीली होनी चाहिये ॥ १०६ ॥ अशोधितमनःशिलाया दोषाः मनःशिला त्वशोधिता प्रमादतस्तु शोलिता । हरेद्बलं हि चारुता विनश्यतीह त्वग्गता ॥ १०७ ॥ अशोधिता रोगशिला मलविष्टम्भकारिणी । मूत्ररोधकरी कामं मूत्रकृच्छ्रप्रवर्तिनी ॥ १०८ ॥ अशोधिता शिला मलविष्टम्भकरी मूत्ररोधो मूत्रकृच्छ्रं वेति विकल्पः समुच्चयो वा यथासम्प्राप्तिर्भवति ॥ १०७-१०८ ॥ भा.टी.—यदि अशुद्ध मैनसिल को गलती से सेवन कर लिया जाय तो इसके द्वारा शारीरिक बल तथा त्वचा की सुन्दरता नष्ट हो जाती है । यही नहीं बल्कि अशुद्ध मैनसिल से मलविष्टम्भ, मूत्ररोध ( मूत्र रुकना ) तथ मूत्रकृच्छ्र- रोग हो जाता है ॥ १०७-१०८ ॥ मनःशिलायाः प्रथमः शोधनप्रकारः सुधोदके निपातिता मनःशिला तु चूर्णिता । दिनत्रयाद्विनिर्गता भवेत्तु दोषवर्जिता ॥ १०६ ॥ चूर्णोदके दिनत्रयं निमग्ना शुध्यति ॥ १०६ ॥ भा.टी.—मैनसिल के चूर्ण को चूने के पानी में दो दिन रखे रहने से यह शुद्ध हो जाती है ॥ १०६ ॥