भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२६० · रसतरङ्गिणी द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः कूष्माण्डरससंशुद्धं तालं पलचतुष्टयम् । कुमारीस्वरसेनेह भावयेद्दिनसप्तकम् ॥९६॥ आतपे त्वथ संशोष्य चूर्णयेद्भिषजां वरः । काचकुप्यां निधायाथ वालुकायन्त्रगं पचेत् ॥ १०० ॥ दिनानि सप्त नियतं विधानज्ञो भिषग्वरः । ऊर्ध्वलग्नं तालसत्त्वं पीताभं तु समाहरेत् ॥ १०१ ॥ भागोऽष्टमस्तु गुञ्जायाः प्रयोक्तव्यो विधानतः । कुष्ठादौ योजयेद्धीमान् श्वित्रकुष्ठे विशेषतः ॥१०२॥ द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः सुगमः । तत्र हि पीताभं तालकसत्त्वं भवतीतं विशेषः । सत्त्वस्य भक्षणयोग्या मात्रा गुञ्जाष्टमो भागः ॥ ९६-१०२ ॥ भा.टी.—पेठे के स्वरस में शुद्ध किया हुआ हरताल चार पल लेकर उसे सात दिन तक कुमारीस्वरस में डालकर भावना दें । सात दिन के बाद निकाल धूप में सुखाकर चूर्ण कर लें । अब इसको उक्त विधि से कांच की शीशी में भर कर बालुकायन्त्र में निरन्तर मन्द-मन्द अग्नि से सात दिन तक पकावें । तदनन्तर स्वांगशीत होने पर शीशी को तोड़कर उसके ऊर्ध्व भाग में लगे हुए पीताभ सत्त्व को निकाल लें । इस सत्त्व की रत्ती का आठवाँ भाग मात्रा का प्रयोग कुष्ठ आदि रोगों में विशेषतः सफेद कोढ़ में करना चाहिये ॥ ९६-१०२॥ तालकविकारे भैषज्यम् ससितं जीरकक्षोदं कूष्माण्डस्वरसन्तु वा । अशनीयात्तालविकृतौ त्रिवारं त्वेकवासरे ॥ १०३॥ तालविकारे सति तस्य शमनाय भेषज्यं जीरकचूर्णं कूष्माण्डरसो वा ॥१०३॥ भा. टी.—वर्की हरताल या हरताल के योगों के सेवन से शरीर में कोई विकार उत्पन्न हो जाय तो उनका प्रभाव दूर करने के लिये पेठे के स्वरस में मिश्री और जीराचूर्ण मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करना चाहिये ॥१०३॥ अथ मनःशिलाया नामानि मनःशिला रोगशिला शिला नैपालिका तथा । मनोगुप्ता मनोज्ञा च मनोह्वा नागजिह्विका ॥ १०४ ॥

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