भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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एकादशस्तरङ्गः २५६ वक्तव्य—शुद्ध हरताल के चावलों के बराबर टुकड़ों को अभ्रकपत्रों के बीच में बराबर रखकर पत्रों के किनारे को पहिले सुई-तागे से सी दें, पश्चात् इसको गीले आटे से लेप करके सुखा लें। अब इस पत्र सम्पुट को जलते हुए कोयलों पर रखें और देखते जायँ । जब पत्रों के बीच में धुआँ उड़कर बन्द हो जाय और हरताल लाल-काला सा दीखने लगे तो तुरन्त चिमटे से पत्रसम्पुट को उठाकर दूसरी तरफ लौटा लें और लालवर्ण का हरताल दीखने पर कोयलों से पृथक् करके हरताल को निकाल लें । तालकसत्त्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः तालं पलद्वयमितं सौभाग्यं तत्समं हरेत् । भावयेन्मेषिकादुग्धैः कूष्माण्डसलिलैस्ततः ॥ ९४ ॥ कुमारीस्वरसेनाथ निम्बूकस्य द्रवेण च । ततः समन्तदुग्धायाः पयसा तु विभावयेत् ॥ ९५ ॥ विभाव्य च रविच्छीरैः रुबुतैलेन पेषयेत् । मध्वाज्येनापि सम्पेष्य वटकान् कारयेत्ततः ॥ ९६ ॥ काचकुप्यां निधायाथ वालुकायन्त्रमध्यगम् । मन्दाग्निनैव नियतं पचेद्दिनचतुष्टयम् ॥९७॥ स्वतः शीतं समुद्धृत्य विमलं कुलिशप्रभम् । ऊर्ध्वलग्नं तालसत्त्वं कूपीं भित्त्वा समाहरेत् ॥ ९८ ॥ तालकसत्त्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः—तालं १६ तो०, टङ्कणं मेषीदुग्धकूष्मा- एडकुमारीनिम्बू रसैः सेहुण्डदुग्धेन अर्कक्षीरेण एरण्डतैलेन मधुना घृतेन च पेष- येत् । गोलकान् विधाय वालुकायन्त्रे मन्दाग्निना पचेत् । कुलिशप्रभं हीरक- सदृशं चाकचक्ययुक्तमित्यर्थः, तालसत्त्वमाददीत ॥ ९४–९८ ॥ भा.टी.—दो पल शुद्ध हरताल और दो पल सुहागा दोनों एकत्र लेकर भेड़ के दूध में, पेठे के स्वरस में, घीकुआर के रस में, निम्बू के रस में और थूहर के दूध तथा आक के दूध में घोटकर अन्त में एरण्डतैल और मधु तथा घृत के साथ मर्दन करके इसकी बड़ी-बड़ी गोलियाँ बना लें । अब सूखी हुई गोलियों को एक कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में भरकर वालुकायन्त्र में मन्द-मन्द अग्नि से चार दिन तक निरन्तर पकावें । स्वांगशीत होने पर शीशी के ऊर्ध्व भाग में लगे हुए वज्र के सदृश कठोर चमकीले हरतालसत्त्व को कूपी को फोड़कर निकाल लें ॥ ९४–९८ ॥