रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ रसतरङ्गिणी कर चारों तरफ से बन्द कर दें और एक सिकोरे में रखकर दूसरे सिकोरे से ढक कर अच्छी तरह बेर के पत्तों के कल्क से सन्धिलेप करके सुखा लें । अब इस प्याले या सिकोरों के सम्पुट को वालुकायन्त्र के बीच में रखकर तीन घंटे मध्यम- मध्यम अग्नि देकर पकायें । यन्त्र के स्वांगशीत होने पर संपुट को निकाल अभ्र- कपत्रों के बीच में से माणिक्यमणि के सदृश हरे वर्ण के रस को निकाल लें । इस रसमाणिक्य की दो रत्ती मात्रा प्रतिदिन प्रयोग करने पर भयंकर वातरक्त, भयंकर फिरंग, अनेक प्रकार के कुष्ठ, नाड़ीव्रण, भगन्दर तथा नासिका और मुख में होनेवाले रोग अवश्य नष्ट हो जाते हैं ॥ ८३-८६ ॥ द्वितीयं रसमाणिक्यम् विमलं पत्रतालन्तु द्रवैः कूष्माण्डसम्भवैः । विभावयेत्सप्तवारं दध्ना चाम्लेन वा तथा ॥ ६० ॥ प्रक्षाल्य तप्ततोयेन यत्नतश्चूर्णयेद्भिषक् । माषद्वयोन्मितं तालं न्यसेन्मध्येऽभ्रपत्रयोः ॥६१॥ अङ्गाराग्नौ निधायाथ वङ्कनालेन धुक्षयेत् । माणिक्याभं भवेद्यावत् पचेत्तावत् प्रयत्नतः ॥ ९२ ॥ अङ्गारानपसार्याथ रसमाणिक्यमुद्धरेत् । वारं वारं ततश्चैवं कृत्वा माणिक्यमाहरेत् ॥ ६३ ॥ अथापरः प्रकारः अभ्रपत्रमध्ये तालकं स्थापयित्वा स्वल्पेष्वप्यङ्गारेषु पाको विधीयते । माषद्वयोन्मितमित्यल्पपरिमाणग्रहणं पाकसौकर्यार्थम् । अभ्रपत्रञ्च प्रत- नुकं व्रणरहितं श्वेताभ्रकीयं ग्राह्यम् । प्रतनुकपत्रे सम्यक् पाको भवति वारं वार- मिति प्रभूततालस्य पाको भागद्वयविभागद्वारा विधेयः ॥६०-६३॥ भा.टी.—स्वच्छ वर्की हरताल को लेकर पेठे के स्वरस तथा खट्टे दही के साथ सात भावना देवें, अन्त में गरम जल से अच्छी तरह धोकर सुखा लें और इसका मोटा-मोटा सा चूर्ण बना लें। अब इसमें से दो मासे चूर्ण लेकर अभ्रक के पत्तों के बीच में रखकर इसको चारों तरफ बन्द करके कोयलों की अग्नि में तपायें और वंकनाल (फूंकनी ) से अग्नि दीप्त करते जायँ । जब हरतल चूर्ण का वर्ण अभ्रकपत्रों के बीच में माणिक्य के सदृश हो जाय तो इस पत्रसम्पुट को अग्नि में से नीचे उतार लें और पत्रों के बीच के माणिक्य को निकालकर पुनः उन पत्रों में हरताल चूर्ण रखकर बन्द करें और अग्नि में पकायें। इस प्रकार सब हरताल का माणिक्यरस बना लें ॥ ६०–६३ ॥