रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
२५८ रसतरङ्गिणी कर चारों तरफ से बन्द कर दें और एक सिकोरे में रखकर दूसरे सिकोरे से ढक कर अच्छी तरह बेर के पत्तों के कल्क से सन्धिलेप करके सुखा लें । अब इस प्याले या सिकोरों के सम्पुट को वालुकायन्त्र के बीच में रखकर तीन घंटे मध्यम- मध्यम अग्नि देकर पकायें । यन्त्र के स्वांगशीत होने पर संपुट को निकाल अभ्र- कपत्रों के बीच में से माणिक्यमणि के सदृश हरे वर्ण के रस को निकाल लें । इस रसमाणिक्य की दो रत्ती मात्रा प्रतिदिन प्रयोग करने पर भयंकर वातरक्त, भयंकर फिरंग, अनेक प्रकार के कुष्ठ, नाड़ीव्रण, भगन्दर तथा नासिका और मुख में होनेवाले रोग अवश्य नष्ट हो जाते हैं ॥ ८३-८६ ॥ द्वितीयं रसमाणिक्यम् विमलं पत्रतालन्तु द्रवैः कूष्माण्डसम्भवैः । विभावयेत्सप्तवारं दध्ना चाम्लेन वा तथा ॥ ६० ॥ प्रक्षाल्य तप्ततोयेन यत्नतश्चूर्णयेद्भिषक् । माषद्वयोन्मितं तालं न्यसेन्मध्येऽभ्रपत्रयोः ॥६१॥ अङ्गाराग्नौ निधायाथ वङ्कनालेन धुक्षयेत् । माणिक्याभं भवेद्यावत् पचेत्तावत् प्रयत्नतः ॥ ९२ ॥ अङ्गारानपसार्याथ रसमाणिक्यमुद्धरेत् । वारं वारं ततश्चैवं कृत्वा माणिक्यमाहरेत् ॥ ६३ ॥ अथापरः प्रकारः अभ्रपत्रमध्ये तालकं स्थापयित्वा स्वल्पेष्वप्यङ्गारेषु पाको विधीयते । माषद्वयोन्मितमित्यल्पपरिमाणग्रहणं पाकसौकर्यार्थम् । अभ्रपत्रञ्च प्रत- नुकं व्रणरहितं श्वेताभ्रकीयं ग्राह्यम् । प्रतनुकपत्रे सम्यक् पाको भवति वारं वार- मिति प्रभूततालस्य पाको भागद्वयविभागद्वारा विधेयः ॥६०-६३॥ भा.टी.—स्वच्छ वर्की हरताल को लेकर पेठे के स्वरस तथा खट्टे दही के साथ सात भावना देवें, अन्त में गरम जल से अच्छी तरह धोकर सुखा लें और इसका मोटा-मोटा सा चूर्ण बना लें। अब इसमें से दो मासे चूर्ण लेकर अभ्रक के पत्तों के बीच में रखकर इसको चारों तरफ बन्द करके कोयलों की अग्नि में तपायें और वंकनाल (फूंकनी ) से अग्नि दीप्त करते जायँ । जब हरतल चूर्ण का वर्ण अभ्रकपत्रों के बीच में माणिक्य के सदृश हो जाय तो इस पत्रसम्पुट को अग्नि में से नीचे उतार लें और पत्रों के बीच के माणिक्य को निकालकर पुनः उन पत्रों में हरताल चूर्ण रखकर बन्द करें और अग्नि में पकायें। इस प्रकार सब हरताल का माणिक्यरस बना लें ॥ ६०–६३ ॥
एकादशस्तरङ्गः २५६ वक्तव्य—शुद्ध हरताल के चावलों के बराबर टुकड़ों को अभ्रकपत्रों के बीच में बराबर रखकर पत्रों के किनारे को पहिले सुई-तागे से सी दें, पश्चात् इसको गीले आटे से लेप करके सुखा लें। अब इस पत्र सम्पुट को जलते हुए कोयलों पर रखें और देखते जायँ । जब पत्रों के बीच में धुआँ उड़कर बन्द हो जाय और हरताल लाल-काला सा दीखने लगे तो तुरन्त चिमटे से पत्रसम्पुट को उठाकर दूसरी तरफ लौटा लें और लालवर्ण का हरताल दीखने पर कोयलों से पृथक् करके हरताल को निकाल लें । तालकसत्त्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः तालं पलद्वयमितं सौभाग्यं तत्समं हरेत् । भावयेन्मेषिकादुग्धैः कूष्माण्डसलिलैस्ततः ॥ ९४ ॥ कुमारीस्वरसेनाथ निम्बूकस्य द्रवेण च । ततः समन्तदुग्धायाः पयसा तु विभावयेत् ॥ ९५ ॥ विभाव्य च रविच्छीरैः रुबुतैलेन पेषयेत् । मध्वाज्येनापि सम्पेष्य वटकान् कारयेत्ततः ॥ ९६ ॥ काचकुप्यां निधायाथ वालुकायन्त्रमध्यगम् । मन्दाग्निनैव नियतं पचेद्दिनचतुष्टयम् ॥९७॥ स्वतः शीतं समुद्धृत्य विमलं कुलिशप्रभम् । ऊर्ध्वलग्नं तालसत्त्वं कूपीं भित्त्वा समाहरेत् ॥ ९८ ॥ तालकसत्त्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः—तालं १६ तो०, टङ्कणं मेषीदुग्धकूष्मा- एडकुमारीनिम्बू रसैः सेहुण्डदुग्धेन अर्कक्षीरेण एरण्डतैलेन मधुना घृतेन च पेष- येत् । गोलकान् विधाय वालुकायन्त्रे मन्दाग्निना पचेत् । कुलिशप्रभं हीरक- सदृशं चाकचक्ययुक्तमित्यर्थः, तालसत्त्वमाददीत ॥ ९४–९८ ॥ भा.टी.—दो पल शुद्ध हरताल और दो पल सुहागा दोनों एकत्र लेकर भेड़ के दूध में, पेठे के स्वरस में, घीकुआर के रस में, निम्बू के रस में और थूहर के दूध तथा आक के दूध में घोटकर अन्त में एरण्डतैल और मधु तथा घृत के साथ मर्दन करके इसकी बड़ी-बड़ी गोलियाँ बना लें । अब सूखी हुई गोलियों को एक कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में भरकर वालुकायन्त्र में मन्द-मन्द अग्नि से चार दिन तक निरन्तर पकावें । स्वांगशीत होने पर शीशी के ऊर्ध्व भाग में लगे हुए वज्र के सदृश कठोर चमकीले हरतालसत्त्व को कूपी को फोड़कर निकाल लें ॥ ९४–९८ ॥
२६० · रसतरङ्गिणी द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः कूष्माण्डरससंशुद्धं तालं पलचतुष्टयम् । कुमारीस्वरसेनेह भावयेद्दिनसप्तकम् ॥९६॥ आतपे त्वथ संशोष्य चूर्णयेद्भिषजां वरः । काचकुप्यां निधायाथ वालुकायन्त्रगं पचेत् ॥ १०० ॥ दिनानि सप्त नियतं विधानज्ञो भिषग्वरः । ऊर्ध्वलग्नं तालसत्त्वं पीताभं तु समाहरेत् ॥ १०१ ॥ भागोऽष्टमस्तु गुञ्जायाः प्रयोक्तव्यो विधानतः । कुष्ठादौ योजयेद्धीमान् श्वित्रकुष्ठे विशेषतः ॥१०२॥ द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः सुगमः । तत्र हि पीताभं तालकसत्त्वं भवतीतं विशेषः । सत्त्वस्य भक्षणयोग्या मात्रा गुञ्जाष्टमो भागः ॥ ९६-१०२ ॥ भा.टी.—पेठे के स्वरस में शुद्ध किया हुआ हरताल चार पल लेकर उसे सात दिन तक कुमारीस्वरस में डालकर भावना दें । सात दिन के बाद निकाल धूप में सुखाकर चूर्ण कर लें । अब इसको उक्त विधि से कांच की शीशी में भर कर बालुकायन्त्र में निरन्तर मन्द-मन्द अग्नि से सात दिन तक पकावें । तदनन्तर स्वांगशीत होने पर शीशी को तोड़कर उसके ऊर्ध्व भाग में लगे हुए पीताभ सत्त्व को निकाल लें । इस सत्त्व की रत्ती का आठवाँ भाग मात्रा का प्रयोग कुष्ठ आदि रोगों में विशेषतः सफेद कोढ़ में करना चाहिये ॥ ९६-१०२॥ तालकविकारे भैषज्यम् ससितं जीरकक्षोदं कूष्माण्डस्वरसन्तु वा । अशनीयात्तालविकृतौ त्रिवारं त्वेकवासरे ॥ १०३॥ तालविकारे सति तस्य शमनाय भेषज्यं जीरकचूर्णं कूष्माण्डरसो वा ॥१०३॥ भा. टी.—वर्की हरताल या हरताल के योगों के सेवन से शरीर में कोई विकार उत्पन्न हो जाय तो उनका प्रभाव दूर करने के लिये पेठे के स्वरस में मिश्री और जीराचूर्ण मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करना चाहिये ॥१०३॥ अथ मनःशिलाया नामानि मनःशिला रोगशिला शिला नैपालिका तथा । मनोगुप्ता मनोज्ञा च मनोह्वा नागजिह्विका ॥ १०४ ॥
कुनटी कुलटी गोला नागमाता च सा मता । कल्याणिका च सैवेह कथिता रसनेत्रिका ॥ १०५ ॥ अथ मनःशिला—नैपालिका, तद्देशजातत्वात् ॥ १०४-१०५ ॥ भा.टी.—मनःशिला, रोगशिला, शिला, नैपालिका, मनोगुप्ता, मनोज्ञा, मनोहा, नागजिह्विका, कुनटी, कुलटी, गोला, नागमाता, कल्याणिका, रस- नेत्रिका; ये सब नाम मैनसिल के कहे जाते हैं ॥ १०४-१०५ ॥ शोधनोचितशिलायाः स्वरूपम् मनःशिला शिलाखण्डशून्या रक्तोत्पलप्रभा । भारे गुरुतरा दीप्ता शोधनार्हा मता बुधैः ॥ १० ॥ उत्तममनःशिलापरिचयः—दीप्ता सचकचकया, शोधनार्हा ग्राह्येत्यर्थः॥१०॥ भा.टी—शोधन के योग्य मैनसिल पत्थर-कंकड़ रहित, लाल कमल के सदृश प्रभावानी, वजन मे भारी और चमकीली होनी चाहिये ॥ १०६ ॥ अशोधितमनःशिलाया दोषाः मनःशिला त्वशोधिता प्रमादतस्तु शोलिता । हरेद्बलं हि चारुता विनश्यतीह त्वग्गता ॥ १०७ ॥ अशोधिता रोगशिला मलविष्टम्भकारिणी । मूत्ररोधकरी कामं मूत्रकृच्छ्रप्रवर्तिनी ॥ १०८ ॥ अशोधिता शिला मलविष्टम्भकरी मूत्ररोधो मूत्रकृच्छ्रं वेति विकल्पः समुच्चयो वा यथासम्प्राप्तिर्भवति ॥ १०७-१०८ ॥ भा.टी.—यदि अशुद्ध मैनसिल को गलती से सेवन कर लिया जाय तो इसके द्वारा शारीरिक बल तथा त्वचा की सुन्दरता नष्ट हो जाती है । यही नहीं बल्कि अशुद्ध मैनसिल से मलविष्टम्भ, मूत्ररोध ( मूत्र रुकना ) तथ मूत्रकृच्छ्र- रोग हो जाता है ॥ १०७-१०८ ॥ मनःशिलायाः प्रथमः शोधनप्रकारः सुधोदके निपातिता मनःशिला तु चूर्णिता । दिनत्रयाद्विनिर्गता भवेत्तु दोषवर्जिता ॥ १०६ ॥ चूर्णोदके दिनत्रयं निमग्ना शुध्यति ॥ १०६ ॥ भा.टी.—मैनसिल के चूर्ण को चूने के पानी में दो दिन रखे रहने से यह शुद्ध हो जाती है ॥ १०६ ॥
२६२ रसतरङ्गिणी द्वितीयः शोधनप्रकारः भृङ्गराजरसेनेह दोलायन्त्रे विपाचिता । चतुर्यामं रोगशिला शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११० ॥ भृङ्गरसे यामचतुष्टयं स्विन्ना च शुध्यति ॥ ११० ॥ भा.टी.---मैनसिल को पोटली में बाँधकर इसको दोलायन्त्र में भांगरा- स्वरस डालकर चार पहर तक पकाने से यह शुद्ध हो जाती है ॥ ११० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः बीजपूररसेनेह भाविता तु मनःशिला । सप्तवारं विधानेन विशुध्यति न संशयः ॥ १११ ॥ बीजपूरो निम्बूकविशेषः ॥ १११ ॥ भा.टी.---मैनसिल को सात भावना बिजौरा नींबू के रस की देकर अन्त में उसे जल से धोकर सुखा लेने से वह शुद्ध हो जाती है ॥ १११ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः जयन्तीस्वरसेनेह दोलायन्त्रे विपाचितः । चतुर्यासं विधानेन विशुध्यति मनःशिला ॥ ११२ ॥ जयन्ती 'जइता' इति भाषायाम् ॥ ११२ ॥ भा.टी.---जयन्ती स्वरस को दोलायन्त्र में डालकर इसमें मैनसिल की पोटली को चार पहर तक स्वेदन करने से भी यह शुद्ध हो जाती है ॥११२॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः अगस्त्यपत्रस्वरसैर्भावयेत्सप्तवारकम् । मनःशिला प्रयत्नेन शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११३ ॥ अगस्त्यः तदाख्यः पुष्पतरुः प्रसिद्धः ॥ ११३ ॥ भा.टी.---अगस्त्य पत्तों के स्वरस में मैनसिल की सात भावना देकर सुखा लेने से वह शुद्ध हो जाती है ॥ ११३ ॥ षष्ठः शोधनप्रकारः आर्द्रकस्वरसेनेह मनोगुप्तां हु भावयेत् । सप्तवारं विधानेन शुद्धिमाप्नोति सर्वथा ॥ ११४ ॥ भा.टी.---मैनसिल को अदरख की सात भावना देकर सुखा लें तो वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाती है ॥ ११४ ॥
एकादशस्तरङ्गः २६३ अथ मनःशिलाया गुणाः मनःशिला कटुस्तिक्ता स्निग्धोष्णा लेखनी गुरुः । कासश्वासहरा कामं भूतोपद्रवनाशिनी ॥११५॥ अग्निमान्द्यक्षयानाहहन्त्री कण्डूतिनाशिनी । रसायनी ज्वरहरा वर्ण्या कामं विषापहा ॥११६॥ भूतोपद्रवा जीवाणुजाता व्याधयः । वर्ण्या वर्णप्रसादनी ॥११५-११६॥ भा.टी.—मैनसिल रस में कटु और तिक्त होती है। गुणों में स्निग्ध, उष्ण और गुरु होती है। यह लेखन (शोथ आदि में कफ को पतला कर निकालना) कार्य करती है। कास और श्वास रोगों में लाभदायक है, जीवाणुजन्य रोगों को नष्ट करती है। इसके अतिरिक्त अग्निमान्द्य, क्षय तथा अफरा, कब्ज और कण्डू को मिटाती है। यह नियमपूर्वक शुद्ध रूप में सेवन करने से हरताल की भाँति शरीर में रसायनकार्य करती है। पुराने ज्वरों और नवीन ज्वरों में लाभदायक, त्वचा के रोगों को नष्ट करके उसकी सुन्दरता को बढ़ाती है और विषनाशक है ॥११५-११६॥ विशुद्धमनःशिलाया मात्रा तत्त्वांशतो रक्तिकायाः कलांशप्रमितां तथा । शिला मात्रा विनिर्दिष्टा काशीनाथभिषक्तमैः ॥११७॥ अथास्या मात्रा—तत्त्वांशतो रक्तिकाया इति चतुर्विंशत्यंशत इति भावः । कलांशप्रमितां षोडशभागमिताम् ॥ ११७ ॥ भा.टी. - शुद्ध मैनसिल की मात्रा रत्ती के ३२ वें भाग से लेकर सोलहवें भाग तक रोगी के बलाबल को देखकर प्रयुक्त की जा सकती है ॥ ११७ ॥ अस्यामयिकः प्रयोगः वासकस्वरसोपेता त्र्यूषणक्षौद्रसंयुता । मनःशिला शीलिता तु कासं श्वासं व्यपोहति ॥११८॥ पिप्पलीमरिचोपेता धारिणाञ्जनयोगतः । नैपालिका तु नियतं नाशयेद्विषमज्वरान् ॥११९॥ वैदेहीनिम्बबीजोत्थचूर्णोपेता मनःशिला । कारवेल्लोर सैर्लीढा त्रिदोषज्वरहारिणी ॥१२०॥ सैन्धवमरिचमनोज्ञाशंखैः क्रमवृद्धभागसंमिश्रैः । अपनयतीह निकामं नेत्रगदान् विधिवदुपयुक्ता ॥१२१॥ रसाञ्जनान्विता शिला कपोतगूथसंयुता । शिला सुपेषिताञ्जनात्त्वपस्मृतिं विनाशयेत् ॥१२२॥
२६४ रसतर्ङ्गिणी रजनीद्वयमञ्जिष्ठाक्षारक्षोदान्विता शिला । घृतक्षौद्रैः प्रलेपात्तु वर्ण्या त्वग्दोषनाशिनी ॥१२३॥ पिप्पलीनागरोपेता कपित्थरससंयुता । लाजान्विता तु मधुना लीढा छर्दिं विनाशयेत् ॥१२४॥ रोगयोग्यः प्रयोगः—त्र्यूषणक्षोदः त्रिकटुचूर्णम् । कपोतगूथं कपोतविष्ठा । क्षारक्षोदः यवक्षारचूर्णम् । अथ प्रसङ्गान्मनःशिलीयो माणिक्यरसः—शुद्धवर- नागस्याष्टौ तोलकानि, हिङ्गुलोत्थपारदस्याष्टौ तोलकानि, मनःशिलायाः शुद्धाया अष्टौ तोलकानि, शुद्धगन्धस्याष्टौ तोलकानि । वरनागं वह्निगलितं पारदेन सह सम्मेल्यातिश्लक्ष्णां पिष्टिं विधाय शिलागन्धाभ्यां सावधानतया पेषयेत् । वालुका- यन्त्रे षोडश यामान् विपचितो रससिन्दूराभो भवति माणिक्यो रसः । स च नागादिसम्पर्कजातो विशेषतः कफप्रधानं राजयक्ष्माणमाद्यावस्थायां दत्तो हन्ति । मात्रा रक्तिकार्द्धपर्यन्तमिति । योगोऽयं यक्ष्मचिकित्सासु रसमाणिक्यनाम्ना व्यवहृतः पूर्वैरिति ॥ ११८–१२४ ॥ भा.टी.—शुद्ध मैनसिल में त्रिकटुचूर्णा मिला वासास्वरस के साथ सेवन करने से कास-श्वास रोग में लाभ होता है । विषमज्वरों के वेग को रोकने के लिये मैनसिल में पिप्पलीचूर्ण मिला जल से पीसकर आंखों में अञ्जन किया जाता है । त्रिदोषप्रकोपजन्य ज्वरों को दूर करने के लिये मैनसिल में पिप्पली तथा निम्बबीजचूर्ण मिला करेले के पत्रस्वरस से गोली बनाकर प्रयोग किया जाता है । सेन्धानमक एक भाग, कालीमिर्च चूर्ण दो भाग, मैनसिल तीन भाग, शंखभस्म चार भाग लेकर, इनका बारीक चूर्ण करके अञ्जन बना लें, इसको आँखों में लगाने से नेत्र रोग नष्ट होते हैं । अपस्मार रोग में मैनसिल, रसौंत तथा कबूतर की विष्ठा, इनका अञ्जन बनाकर आंखों में लगाने से आराम आता है । त्वक् रोगों या त्वचा की खराबी में मैनसिल में हरिद्रा, मञ्जिष्ठाचूर्ण और यवक्षार मिला घी और शहद के साथ शरीर में लेप करने से आराम आता है । वमन रोकने के लिये मैनसिल को पिप्पली और सोंठ चूर्ण, और धान का लावा में मिलाकर कैथ के स्वरस तथा मधु के साथ चटाया जाता है ॥ ११८–१२४ ॥ अशुद्धमनःशिलाविकारे भेषज्यम् शिलाविकारोपहतः पिवेत्क्षीरं दिनत्रयम् । मधुना पथ्यसंयुक्तो वान्त्यादिभ्यो विमुच्यते ॥१२५॥
भा.टी.—अशुद्ध मैनसिल सेवन करने से यदि शरीर में कोई उपद्रव हो जाय तो रोगी को तीन दिन तक दूध में शहद मिला कर पिलावें और पथ्य- पूर्वक रक्खे तो वमन, तृष्णा आदि उपद्रव शान्त हो जाते हैं ॥ १२५ ॥ मनःशिलाया निर्माणप्रकारः विशोधितं शंखविषं मरुद्भागमितं तथा । विशुद्धं गन्धपाषाणं कलाभागिकमाहरेत् ॥ १२६ ॥ खल्वे निक्षिप्य यत्नेन चूर्णयेद्विषजां वरः । चूर्णितञ्चाथ विज्ञाय यन्त्रे डमरुकाभिधे ॥ १२७ ॥ पचेत्ततः स्वतः शीते कुनटीमुर्ध्वगं हरेत् । प्रयोजयेद्विधानेन मात्रा सर्षपसंमिता ॥ १२८ ॥ अथ मनःशिलानिर्माणप्रकारः—शङ्खविषं गौरीपाषाणकं ४६ भागमितम्, गन्धकस्य १६ भागाः । मात्रा तु सर्पपमिता ॥ १२६–१२८॥ भा.टी.—शुद्ध संखिया उनचास भाग, शुद्ध गन्धक सोलह भाग, दोनों को खरल में एकत्र सूक्ष्मचूर्ण करके डमरूयन्त्र में डालकर पकायें । स्वांग- शीतल होने पर यन्त्र के ऊपर की हांडी के भीतर लगी हुई मैनसिल को निकाल कर प्रयोगों में काम लायें । इसकी मात्रा एक सरसों के बराबर समझनी चाहिये ॥ १२६–१२८ ॥ मनःशिलायाः सत्त्वपातनम् गुडगुग्गुलुकित्टाज्यैस्त्वष्टमांशेन वै पृथक् । शिला मूषागता कोष्ठ्यां ध्माता सत्त्वं विमुञ्चति ॥ १२६ ।' किट्टं मण्डूरम् ॥ १२६ ॥ भा.टी.—मैनसिल में गुड़, गूगल, लौहकिट्ट (मण्डूर) और घी, ये सब आठवां भाग डाल कर मूषा में रख कर कोष्ठी में तपाने से मैनसिल का सत्त्व निकल आता है ॥ १२६ ॥ अथ शंखविषस्य नामानि शंखमूषं शंखविषं गौरीपाषाणकं तथा । दारुमूषं दारुमृषा दारुमोचञ्च मल्लुकः ॥ १३० ॥ फेनाश्मभस्मसंज्ञश्च सोमलः सम्बलं तथा । आखुपाषाणकं चैव रसज्ञैः परिकीर्तितम् ॥ १३१ ॥ अथ शङ्खविषनामानि तन्त्रे व्यवहृतानि । फेनाश्मभस्मेति सुश्रुततन्त्रनिर्दिष्टं
२६६ रसतरङ्गिणी नाम । तत्र हि धातुविषतया सङ्गृहीतमेतत् । उक्तं हि “फेनाश्मभस्म हरिताल- ञ्चेति धातुविषे” । क्वचिद् विकटनाम्नापि व्यवहृत इति ॥ १३०-१३१ ॥ भा.टी.—शंखमूष, शंखविष, गौरीपाषाण, दारूमूष, दारूमूषा, दारुमोच, मल्लक, फेनाश्मभस्म, सोमल, सम्बल, आखुपाषाण, इन नामों से संखिया शास्त्रों में व्यवहृत होता है ॥ १३०-१३१ ॥ शङ्खविषस्य द्वैविध्यम् मल्लस्तु द्विविधः प्रोक्तः श्वेतोऽन्यो रक्तकस्तथा । कृत्रिमः श्वेतमल्लस्तु रक्तश्चाकरसंभवः ॥ १३२ ॥ अथास्य भेदाः—श्वेतरक्तवर्णभेदेन मल्लो द्विधा इति सोऽयं द्वेधा विभागः योगरत्नाकराद्युक्त एव रसतन्त्रे व्यवहारार्थमनूदित आचार्यैः । तथाच योगरत्ना- करे “गौरीपाषाणकः प्रोक्तो द्विविधः श्वेतरक्तकः । श्वेतः शङ्खसदृग् रक्तो दाडि- माभः प्रकीर्तितः ॥ श्वेतः कृत्रिमकः प्रोक्तो रक्तः पर्वत-सम्भवः । विपरूपधरौ तौ हि रसकर्मणि पूजितौ ॥” इति । वस्तुतस्तु श्वेतरक्तपीतकृष्णभेदेन चतुर्विधः प्राप्यते मल्लः । तत्र श्वेत एव बहुव्यवहार्यः । इतरे तु क्वचिदेवेति विशेषः । अत्रापि सर्वत्र श्वेतमल्लस्यैव प्रयोगा निर्दिष्टा इति विभावनीयम् ॥ १३२ ॥ भा.टी.—संखिया के दो भेद माने गये हैं । १—श्वेत संखिया, २—रक्त (लाल) संखिया । इनमें से सफेद संखिया कृत्रिम (बनाया हुआ) और लाल संखिया खनिज होता है ॥ १३२ ॥ वक्तव्य—वास्तव में संखिया श्वेत रक्त पीत कृष्ण भेद से चार प्रकार का होता है । परन्तु इनमें से श्वेत मल्ल अधिक व्यवहार में आता है । अथ शङ्खविषस्य शोधनम् सुचूर्णितं शंखविषं दृढं वस्त्रेण रोधयेत् । मेघनादरसेनैव दोलायन्त्रे विपाचयेत् ॥ १३३ ॥ मृद्वग्निना दिनैकन्तु शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् । इत्थं विशोधितं शंखविषं यत्नेन योजयेत् ॥ १३४ ॥ अथास्या शोधनम्—मेघनादस्तण्डुलीयकः । कारवेल्लीरसेन शोधनं साम्प्र- दायिकम् । काञ्जिकेनापि दोलायन्त्रविधिना शुध्यति मल्लः ॥ १३३-१३४ ॥ भा.टी.—संखिया का मोटा-मोटा चूर्ण करके एक दृढ़ वस्त्र में अच्छी तरह बाँध कर पोटली बना लें । अब इस पोटली को दोलायन्त्र में चौलाई का
एकादशस्तरङ्गः २६७ का स्वरस डालकर उसमें दिन भर मन्द-मन्द अग्नि से पकायें तो संखिया शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध संखिया को सावधानी से काम में लावें ॥१३३-१३४ मल्लशोधनस्य द्वितीयः प्रकारः मल्लचूर्णं त्वाजरसैर्दोलायन्त्रे विपाचयेत् । दिनैकन्तु विधानज्ञो मल्लः शुद्धिंमवाप्नुयात् ॥१३५॥ भा.टी.—मल्ल के चूर्ण को पोटली में बांधकर बकरी के दूध अथवा मांस रस में दोला यन्त्र द्वारा एक दिन पकाने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ १३५ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः कारवेल्लीरसेनेह दोलायन्त्रे दियामकम् । विपाचितं शङ्खविषं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥१३६॥ भा.टी.—संखिया को उक्तविधि से करेले के पत्ररस में दोलायन्त्र द्वारा पका लेने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ १३६ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः विपाचितं शङ्खविषं यत्नतष्टङ्कणाम्भसा । गव्यदुग्धेन वा यामं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥१३७॥ भा.टी.—संखिया को सुहागे के जल अथवा गोदुग्ध में दोलायन्त्र द्वारा पका लेने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ १३७ ॥ विशुद्धमल्लस्य गुणाः गौरीपाषाणकः स्निग्धो दोषघ्नो रसबन्धकृत् । कफवातामयहरः वृश्चिकादिविषप्रणुत् ॥१३८॥ मासमात्रप्रयोगेण श्वासं परमदारुणम् । विविधानि च कुष्ठानि नाशयेन्नैव संशयः ॥१३९॥ श्लीपदोत्थज्वरध्वंसी प्रकामं कामवर्धनः । सन्धिवातगदद्वेषी फिरङ्गकरिकेशरी ॥१४०॥ अग्निमान्द्यहरः कामं विषमज्वरनाशनः । कान्तिप्रदः परं जीर्णपाण्डुरोगनिषूदनः ॥१४१॥ श्वासं प्रतमकं हन्ति चिरोत्थं त्वतिदारुणम् । द्रुतमारम्भवेलायां यक्ष्माणमपि नाशयेत् ॥१४२॥ हृच्छूलजं ज्वरोत्थञ्च हृद्दौर्बल्यं द्रुतं हरेत्। अतीसारं निहन्त्याशु मुक्तमात्रसमुत्थितम् ॥१४३॥
२६८ रसतरङ्गिणी मल्लो बाह्यप्रयोगेण क्षारकर्मकरः परम् । शोथसन्तापशैथिल्यकरश्च परिकीर्तितः ॥१४४॥ अथास्य गुणाः—स्निग्धः स्पर्शतः । अवशिष्टगुणनिर्देशः प्रायः प्राचीनरस- तन्त्रानुक्तोऽनुभूतचरश्चेति ध्येयम् । एवमग्रेऽपि । बाह्यप्रयोगे च क्षारकर्म दारण- भेदनादि तत्करोतीति ॥ १३८–१४४ ॥ भा.टी.—संखिया स्पर्श में स्निग्ध (चिकना), दोषनाशक और पारद का बन्ध करनेवाला लिखा है। यह कफ वायु के सब रोगों को नष्ट करता है और बिच्छू आदि के विष को नष्ट करता है। यदि शुद्ध संखिया एक मास तक उप- युक्त विधि से सेवन किया जाय तो इससे भयंकर श्वास रोग तथा अनेक प्रकार के कुष्ठ निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं। इसके प्रयोग से श्लीपद (पीलपाँव) रोगजन्य ज्वर नष्ट होता है और कामशक्ति बढ़ जाती है। यह सन्धिवात (गठिया) को नष्ट करता और फिरङ्ग का शत्रु तथा अग्निमान्द्य को दूर करने में सर्वोत्तम द्रव्य है। विषमज्वर को समूल नष्ट करता, शरीर की कान्ति को बढ़ाता और पुरानी रक्ताल्पता को दूर करता है। अत्यन्त पुराने भयंकर प्रतमक श्वास को नष्ट करता है। यदि राजयक्ष्मा की आरम्भिक अवस्था में प्रयोग किया जाय तो उसे भी नहीं बढ़ने देता है। हृदयशूल जन्य ज्वरजन्य हृदय की दुर्बलता को शीघ्र ही दूरकर देता है। भोजन के बाद ही प्रतिदिन होनेवाले दस्तों में यह शीघ्र ही आराम देता है। यदि इसे बाह्य प्रयोग में काम लाया जाय तो इसका स्थानिक प्रभाव क्षारों के सदृश होता है। अर्थात् बाह्य प्रदेश के शोथ और सन्ताप उष्णताको शीघ्र ही कम कर देता है ॥ १३८–१४४ ॥ वक्तव्य—संखिया और हरतालभस्म के गुण प्रायः सदृश ही होने से इनका एक जैसा ही प्रभाव समझना चाहिये। सोमल का निष्क्रमण अधिक मात्रा में मूत्र तथा मल द्वारा होता है और अल्प मात्रा में पित्ताशय से पित्त तथा त्वचा के स्वेद और मुख की लाला द्वारा भी होता है। इसी प्रकार अश्रुओं और स्तन्य द्वारा भी यह निकलता है। अतः सोमल या सोमलयुक्त औषधि का सेवन बन्द करने पर भी यह तीन सप्ताह तक शरीर में पाया जाता है। शङ्खविषस्य मात्रानिरूपणम् खनेत्रेन्दुमिताद् भागाद् रक्तेरारभ्य यत्नतः । खवह्निभागप्रमितं शङ्खमूषं नियोजयेत् ॥१४५॥ अथास्य मात्रा—गुञ्जायाः १२० तमभागा ( १/१२० र० )—दारभ्य ३० तम-
एकादशस्तरङ्गः २६६ भाग ( १/३० )-पर्यन्तमस्य मात्राव्यवहारो निरापद इति ध्येयं सुधीरैः ॥१४५॥ भा.टी.-संखियाभस्म या शुद्ध संखिया को रत्ती के एक सौ बीसवें ( १/१२० ) भाग से लेकर तीसवें ( १/३० ) भाग तक अन्ततः प्रयोग में ले सकते हैं ॥१४५॥ अन्यः प्रकारः आरभ्य दशमांशात्तु सर्षपस्य प्रयत्नतः । तृतीयभागपर्यन्तं मात्रां मल्लस्य योजयेत् ॥ १४६ ॥ मात्राप्रकारान्तरं शिष्यबुद्धिसौकर्यार्थम् ॥ १४६ ॥ भा.टी.-एक सरसों के दशवें भाग ( १/१० ) से लेकर सरसों के तृतीय भाग ( १/३ ) तक भी सोमल की मात्रा समझनी चाहिये ॥ १४६ ॥ वक्तव्य—रत्ती का १/१० वाँ भाग अथवा १/३ वाँ भाग तोलना कठिन होने से यह द्वितीय मात्रा-निर्माण प्रकार बहुत सरल रहता है । शङ्खविषस्य मात्रानिर्माणविधिः गुञ्जोन्मितं शंखविषं तिथिमाषकसंमिते । मरिचचूर्णे निक्षिप्य शृङ्गवेराम्भसा ततः ॥ १४७ ॥ खल्वमध्ये निधायाथ मर्दयेत् दिनत्रयम् । निर्मापयेत्ततो युक्त्या वटिकाँ रक्तिकोन्मिताः ॥ १४८ ॥ एकैकां वटिकाञ्चाथ सायम्रातस्ततो भिषक् । बीतशङ्कः प्रयुञ्जीत तत्तद्दोषापनुत्तये ॥ १४६ ॥ अनेनैव तु मानेन प्रयोगोद्दिष्टभेषजैः । एतत्सम्मेल्य निर्माय वटिकादीन् प्रयोजयेत् ॥ १५० ॥ मात्रानिर्माणप्रकारः—मल्लविषं १ गुञ्जा, मरिचचूर्णस्य १५ माषकाः । आर्द्रकजलेन पेषयेत् । स्पष्टमन्यत् ॥ १४७-१५० ॥ भा.टी.—एक रत्ती शुद्ध संखिया लेकर उसमें पन्द्रह मासा कालीमिर्च के चूर्ण को मिला अदरक के रस से खरल में अच्छी तरह तीन दिन तक मर्दन करके एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें । अब इन गोलियों में से एक गोली सुबह और एक गोली शाम को तत्तद् दोष शान्ति के लिए निःशंक होकर प्रयोग करें । इसी प्रमाण से ही भिन्न-भिन्न प्रयोगों की औषधियों के साथ इसको मिला कर गोली, चूर्ण आदि बना लें ॥ १४७-१५० ॥ मात्रानिर्माणे सावधानता रक्तिसंमितमल्लस्य भक्षणात् पुरुषो यतः । यमालयं प्रयातीह सावधानतया ततः ॥ १५१ ॥
२७० रसतरङ्गिणी देशकालादिकं वीक्ष्य रोगिणश्च बलाबलम् । मात्रां प्रकल्पयेद्धीरो रसायनचिकित्सकः ॥ १५२ ॥ मात्रानिर्माणे सावधानताऽपेक्षिता, मारकत्वादपप्रयुक्तस्य ॥१५१-१५२॥ भा.टी.-क्योंकि एक रत्ती सोमल के खाने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। अतः देश, काल, अवस्था, रोगी का बल, दोष आदि का विचार करके बड़ी सावधानी से इसकी मात्रा निर्धारित करनी चाहिये ॥ १५१-१५२ ॥ शङ्खविषस्य आमयिकः प्रयोगः वासासत्त्वेन वा व्याघ्रीचूर्णेन परिशीलितः । मल्लश्चिरोत्थितञ्चातिदारुणं श्वासमुद्धरेत् ॥ १५३ ॥ पञ्चतिक्तस्य सत्त्वेन चूर्णेनाप्यथवाशितः । मल्लो विनाशयत्याशु कुष्ठानि विविधानि तु ॥ १५४ ॥ गुडूच्यर्कशिफाचूर्णैर्यत्नतः परिशीलितः । मल्लः सुनिर्मलस्तूर्णं निहन्ति श्लीपदज्वरम् ॥ १५५ ॥ करञ्जबीजचूर्णेन सेवितः सम्बलोऽमलः । शीतज्वरं निहन्त्याशु दिनैकेन न संशयः ॥१५६॥ शुण्ठीपुनर्नवाचूर्णैर्मल्लस्त्रिदिनसेवनात् । आमवातं हरेद् घोरं ज्वरञ्चापि तदुद्भवम् ॥ १५७ ॥ विशोधितं शंखविषं सलोहं परिशीलितम् । नाशयत्यचिरादेव पाण्डुरोगं चिरोत्थितम् ॥ १५८ ॥ जातिपत्रोलवङ्गाभ्यां मल्लः संसेवितोऽमलः । नाशयत्याशु नियतं फिरङ्गमतिदारुणम् ॥ १५६ ॥ रससिन्दूरलोहाभ्यां यक्ष्माणं नाशयेद् ध्रुवम् । शङ्खिनीचूर्णसंयुक्तं हृद्दौर्बल्यं विनाशयेत् ॥१६०॥ शुण्ठीमरिचचूर्णेन श्वेतमल्लो निषेवितः । भुक्तमात्रसमुद्भूतमतीसारं विनाशयेत् ॥ १६१ ॥ जलेन लेपयेद्यत्नान् मल्लं वृश्चिकदंशने । नाशयेद् घटिकार्धेन वृश्चिकार्तिं सुदारुणाम् ॥ १६२ ॥ शंखविषस्य रोगयोग्यः प्रयोगः-अर्कशिफा अर्कमूलम् । श्लीपदज्वरं च “शाखायां मुष्कयोर्वापि रोगशोथरुजाकरः । पश्चान्ते प्रायशो भावी ज्वरः श्लैप-
दिकः स्मृतः" इत्युक्तलक्षणम् । अमलः निर्मल, सम्मलः शंखविषम् । अथ प्रसङ्गादस्य बाह्यान्तः प्रयोगार्थं शङ्खविषद्रावः—विशुद्धयवक्षारः ८७½ ग्रेनमितः, शङ्खविषं ८७½ ग्रेनमितम् जलं २० औन्समितं यावत् इति परिभाषा नवीनत- न्त्रोक्ता ज्ञेया । युवयोग्या मात्रास्य द्वित्रा बिन्दवः । सार्द्धकर्षमिते जले सन्द्राव्य प्रयोज्या । योगोऽयं लेपद्वारा मषकादिषु क्षारकर्मकर इति ॥ १५३-१६३ ॥ भा.टी.—वासासत्व अथवा छोटी कटैलीचूर्ण के साथ मल्ल का सेवन करने से भयंकर पुराना श्वास नष्ट होता है । विविध प्रकार के कुष्ठों में इसको पञ्चतिक्तों के सत्त्व अथवा चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन कराना चाहिये । श्लीप- दज्वर को नष्ट करने के लिये इसको गिलोय तथा आक की जड़ के चूर्ण के साथ सेवन कराना चाहिये । करञ्जबीजचूर्ण के साथ संखिया मिलाकर खिलाने से एक ही दिन में विषमज्वर को रोक देता है । आमवात और आमवातिक ज्वर में संखिया को सोंठ और पुनर्नवाचूर्ण के साथ तीन दिन सेवन कराने से उसमें आराम आ जाता है । संखिया को लोहभस्म में मिलाकर त्रिफलाक- षायानुपान से सेवन करने पर पुरातन पाण्डुरोग नष्ट हो जाता है । जावित्री और लौंगचूर्ण के साथ सोमल मिलाकर सेवन करने से भयंकर और पुराना फिरंग रोग नष्ट हो जाता है । राजयक्ष्मा में इसको रससिन्दूर और लोहभस्म में मिलाकर सेवन कराया जाता है । शंखपुष्पीचूर्ण में मिला संखिया का सेवन कराने से हृदय की दुर्बलता दूर होती है । भोजन करने के बाद तुरन्त ही होने वाले अतीसार में सोमल को सोंठ और मरिचचूर्ण में मिलाकर सेवन करने से आराम आता है । बिच्छू के दंशस्थान में संखिया जल में घिसकर लेप करने से शीघ्र बिच्छू का विष उतर जाता है ॥ १५३-१६२ ॥ वक्तव्य—हरतालभस्म अथवा सोमलभस्म सेवन काल में रोगी को लवण तथा कटुरस और उष्णगुण भोजन नहीं करना चाहिये । यदि रोगी लवणरस त्याग न कर सके तो उसे बहुत थोड़ी मात्रा में सेन्धानमक सेवन कराया जा सकता है । इसके अतिरिक्त सोमलसेवन-काल में अग्निताप तथा धूप में घूमना भी हानिकारक होता है । अथ शङ्खविषोदयरसः गुञ्जोन्मितं शङ्खविषं यत्नतो विमलीकृतम् । मरिचं रससिन्दूरं पृथङ् माषत्रयोन्मितम्॥१६३॥
२७२ रसतरङ्गिणी स्वर्णबीजं कणा शुण्ठी पृथङ् माषद्वयोन्मितम् । आदाय खल्वे संमर्द्य त्रिदिनं निम्बुकाम्बुना ॥१६४॥ निर्मापयेन्निजान्वक्षं वटिका रक्तिकोन्मिताः । एकैकां वटिकां दद्याद् द्विवारं दिवसे भिषक् ॥१६५॥ नामतस्तु समाख्यातो रसः शङ्खविषोदयः । भूतज्वरहरः कामं सन्निपातकुलान्तकः ॥१६६॥ अथ शङ्खविषोदयः—स्वर्णबीजं धत्तूरबीजम्, निजान्वक्षं स्वप्रत्यक्षम्, वटि- कानिर्माणं परिचारकसावधानतार्ज्ञार्थम् । भूतज्वरो विषमज्वरः ॥ १६६ ॥ भा.टी.—शुद्ध सोमल एक रत्ती, कालीमिर्चचूर्ण तीन मासा, रससिन्दूर तीन मासा, शुद्ध धतूराबीज, पिप्पलीचूर्ण प्रत्येक दो-दो मासा लेकर सब को खरल में एकत्र करके निम्बू के स्वरस में तीन दिन तक अच्छी तरह मर्दन करके एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें । इनमें से एक गोली सुबह और एक गोली शाम को सेवन करायें । इसको शंखविषोदय-रस कहते हैं । यह रस विषमज्वर तथा सन्निपातज्वर को नष्ट करता है ॥ १६३-१६६ ॥ अथ चण्डेश्वरो रसः गुञ्जोन्मितं शङ्खविषं यत्नतो विमलीकृतम् अमृतं सुमृतं ताम्रं पृथङ् माषद्वयोन्मितम् ॥१६७॥ श्लक्ष्णपिष्टा कज्जलिका कलामाषकसंमिता । भावयेत्सप्तवारं तु शृङ्गवेरोत्थवारिणा ॥१६८॥ निर्गुण्डीस्वरसेनाथ तथैव खलु भावयेत् । निर्मापयेन्निजान्वक्षं वटिका रक्तिकोन्मिता ॥१६९॥ रसज्ञैः कीर्तितोऽयं तु नाम्ना चण्डेश्वरो रसः । विशेषतः समाख्यातो विविधज्वरनाशनः ॥१७०॥ अथ चण्डेश्वरः—अमृतं वत्सनाभः । कजली १६ माषप्रमिता ॥१६७-१७०॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ संखिया एक रत्ती, शुद्धवत्सना- भविष और शुद्धताम्रभस्म दो-दो मासे, पारदगन्धक की समभाग कजली सोलह मासे लेकर इनको एकत्र खरल में अदरखरस की सात भावना और निर्गुण्डी ( सम्भालु ) स्वरस की सात भावना देकर एक-एक रत्ती की गोली बना लें । यह योग चण्डेश्वररस नाम से कहा जाता है । यह रस अनेक प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है ॥ १६७-१७० ॥
१८ एकादशस्तरङ्गः २७३ मल्लमारणविधिः पलद्वयं सुराक्षारमम्बरीषे न्यसेद्भिषक् । स्तूपाकारतया तत्र चूर्णितं हस्तिदन्तकम् ॥ १७१ ॥ निदध्यादथ चुल्ल्याञ्च वह्निमारोप्य दीपयेत् । यदैकीभूय निर्धूमं भवेद्भस्मानभं तथा ॥ १७२ ॥ तदावतार्य तद् भस्म कूप्यां सम्पेष्य स्थापयेत् । भस्मादस्मात्तु कर्षैकं मषायां सन्निधाय च ॥ १७३ ॥ तोलकप्रमितं शुद्धं मल्लखण्डं ततो न्यसेत् । ऊर्ध्वं दद्यात्पुनर्भस्म कर्षैकप्रमितं च तत् ॥ १७४ ॥ शरावेण निरुध्याथ लावकाख्ये पुटे पुटेत् । सुशुभ्रं भस्म मल्लस्य तस्मादपनयेद् बुधः ॥ १७५ ॥ एवं तु नियतं भस्म मल्लस्य परिजायते । गुणा मात्रानिश्चयश्च ज्ञेयः शोधितमल्लवत् ॥ १७६ ॥ मल्लभस्म यद्यपि प्राचीनैः रसतन्त्रेषु न व्यवहृतम् । तथाप्यद्यत्वे प्रयुज्यत इति कृत्वा मारणप्रकारः उच्यते पलद्वयमित्यादिना । प्रसङ्गान्मल्लभस्मप्रयोगः कथ्यते— मल्लभस्म गुञ्जैकभितं, अहिफेनः माषषट्कमितः, मृगाण्डजं माषकद्वयम्, वह्नि- जारः एकादश गुञ्जाः, कुङ्कुमं माषाष्टकम् । एकत्र घृष्ट्वाः क्षीरेण सुश्लक्ष्णं संमर्च्य वट्यः कार्याः । मात्रा—अर्द्धगुञ्जातो गुञ्जैकपर्यन्ता । पयसा प्रातः प्रयोज्या । मल्लस्य मल्लभस्मनो वा प्रयोगाः प्रायशः भक्तान्ते योज्याः । यदि कथञ्चित् निरन्न एव योज्याः स्युस्तदा प्रभूतसर्पिषा नवनीतेन वा सहैव दातव्याः । एवं योगः क्लैब्यं नाशयति । बलं पुष्टिं च ददाति । सामान्यतः सप्ताहमेकमु- पयुज्य मल्लं मल्लभस्म वा दिनैकं त्याज्यम् । अनयोः सततं प्रयोगः निषिध्यते । दुग्धघृतादीनि विशेषतः सेव्यानि ॥ १७१–१७६ ॥ भा.टी.—मिट्टी की एक चौड़े मुख की हाँड़ी या कूँड़े में दो पल प्रमाण सुराक्षार रखकर उसके ऊपर दो पल प्रमाण हाथीदाँत का चूर्ण इस तरह रखें कि वह नीचे को चौड़ा और ऊपर पतला नुकीला हो जाय, अब इस पात्र को चूल्हे पर रखकर अग्नि जलायें । जब कूँड़े का द्रव्य जलकर निर्धूम होकर एक में मिल जाय अर्थात् भस्म जैसा हो जाय तो पात्र को उतार कर इस भस्म को निकाल पीस कर एक शीशी में भर लें । अब इस भस्म में से दो तोला प्रमाण लेकर एक मूषा में रखें और भस्म के ऊपर एक तोले का शुद्ध मल्ल-
२७४ रसतरङ्गिणी खण्ड रखकर पुनः ऊपर से दो तोला उक्त भस्म भर कर शराव से अच्छी तरह इसका मुख बन्द कर दें और इस संपुट को लावकपुट में रखकर फूँक लें तो सफेद वर्ण की मल्लभस्म हो जायगी । इस विधि से अवश्य ही संखिया भस्म हो जाती है । इस भस्म के गुण तथा मात्रा शुद्ध सोमल के समान ही समझने चाहिये ॥ १७१-१७६ ॥ अथ सुराष्ट्रजाया नामानि सौराष्ट्रदेशसम्भूता मृत्तिका तुवरी मता । सुराष्ट्रजा च सौराष्ट्री सैव सौराष्ट्रमृत्तिका ॥ १७७ ॥ सौराष्ट्रदेश में उत्पन्न होनेवाली मिट्टी को तुवरी (फिटकरी) कहते हैं । इसी को सुराष्ट्रजा, सौराष्ट्री और सौराष्ट्रमृत्तिका भी कहते हैं ॥ १७७ ॥ अथ स्फटिकारिकाया नामानि स्फटिकारिः स्फुटी चैव स्फटिका स्फुटिकारिका । स्फुटिका फटिका चैव शुभ्रा काङ्क्षी च रङ्गदा ॥ १७८ ॥ दृढरङ्गा रङ्गदृढा तथैव दृढरङ्गदा । तुवरी रङ्गदात्री च कथिता भिषजां वरैः ॥ १७६ ॥ भा.टी.—स्फटिकारि, स्फुटी, स्फटिका, स्फुटिकारिका, स्फुटिका, फांटिका, शुभ्रा, कांची, रंगदा, दृढरंगा, रंगदृढा, दृढरंगदा, तुवरी, रंगदात्री; ये सब फिटकरी के नाम हैं ॥ १७८-१७६ ॥ स्फुटिकारिकायाः परिचयः सौराष्ट्रमृत्तिकैवेह निर्भरं निर्मलीकृता । तच्छोधकैर्जनैर्लोके कथिता स्फुटिकारिका ॥ १८० ॥ सुराष्ट्रजाया नामानि स्फटिकारिकायाश्च। उभयोर्नैर्मल्य एव भेदः, तदेतदाह सौराष्ट्रमृत्तिकैवेति । वह्नौ भर्जनाद् उत्फुल्लितैषा शुद्धयति ॥ १८० ॥ भा.टी.—सौराष्ट्रमृत्तिका में से जब साफ करके फिटकरी को पृथक् किया जाता है तो उसे ही स्फुटिकारिका (फिटकरी) कहने लगते हैं ॥ १८० ॥ अस्या गुणाः काङ्क्षी कषाया कटुका च तिक्ता ख्याता तथोष्णा विषदोषहन्त्री । वीसर्पकण्डूतिहरा च केश्या श्वित्रापहा वै व्रणरोपणा च ॥१८१॥
एकादशस्तरङ्गः २७५ नेत्ररोगप्रशमनी विषमज्वरनाशिनी । रतिमन्दिरसङ्कोचकारिणी व्रणहारिणी ॥ १८२ ॥ ग्राहिणी लेखनी स्निग्धा रुधिरस्रावरोधिनी । मुखरोगहरा चैव दन्तदार्ढ्यकरी मता ॥ १८३ ॥ आचार्यैस्तु मृदुवीर्यतया प्रायो बाह्यप्रयोगाच्च शोधनमस्या उपेक्षितम् । विषमज्वरादौ भक्षणार्थन्तु श्वेतायाः स्फटिकारिकायाः शोधनं विधेयमेवेति ॥ १८२-१८३ ॥ भा.टी.—फिटकरी रस में कषाय, कटु (कुछ चरपरी), तिक्त (कुछ कड़वी, और गुण में गरम होती है । यह प्रायः सब विषदोषों को दूर करती है । इसी वास्ते यह वीसर्प-कण्डू रोगों को दूर करती है । इसके प्रयोग से बाल सुन्दर और दृढ़ होते हैं । सफेद कोढ़ में यह लाभ करती है और व्रणों को भरने के काम आती है । नेत्र रोगों में इसका प्रयोग (बाह्य) लाभ पहुँचाता है । इसके सेवन से विषमज्वर नहीं चढ़ता है । यह ग्राही और लेखन है । स्पर्श में स्निग्ध होती है । शरीर के किसी स्थान से निकलनेवाले रक्तस्राव को रोकती है । मुख के क्षतपाकादि रोगों को बाह्य प्रयोग से दूर करती है । दाँतों में मलने से उनको दृढ़ बनाती है ॥ १८१-१८३ ॥ अस्या आमयिकः प्रयोगः मृहारशृङ्गसंयुक्तां चूर्णितां स्फटिकारिकाम् । व्रणेऽवचूर्णयेन्नित्यं रोपणं जायते परम् ॥ १८४ ॥ माषकद्वयमितां तु रङ्गदां निक्षिपेद् द्विपलसंमिते जले । क्षालयेदथ मनोजमन्दिरं नाशयेच्छिथिलतां क्षणादलम् ॥ १८५ ।' स्फटिका गव्यपयसा शीलिता नस्ययोगतः । निहन्ति रुधिरस्रावं नासिकायाः सुदारुणम् ॥ १८६ ॥ सौभाग्यचूर्णसंयुक्तां स्फटिकां निक्षिपेज्जले । द्रवीभूतां ततो ज्ञात्वा क्षालयेत्तेन वारिणा ॥ १८७ ॥ विचर्चिकां चिरोद्भूतां स्राविणीमपि निर्भराम् । दिनसप्तकमात्रेण नाशयेदिह निश्चितम् ॥ १८८ ॥ माषोन्मिता स्फटी तूर्णं चूर्णिता त्ववचूर्णिता । रोधयेद्रुधिरस्रावं सद्य क्षतसमुद्भवम् । १८६ ॥ स्फटीं रक्तित्रयमितां पञ्चतोलकसंमिते । सलिले द्रावयित्वाथ यत्नादुत्तरबस्तिना ॥ १६० ॥
२७६ रसतरङ्गिणी गुरुदर्शितमार्गेण व्रणमेहमुपाचरेत्। व्रणं मेहव्रणं हन्ति पूयस्रावञ्च दारुणम् ॥ १६१ ॥ सितान्विता रक्तिमिता चूर्णिता स्फटिकारिका। अशिता नाशयत्याशु रक्तपित्तं सुदारुणम् ॥ १६२ ॥ स्फटीं गुञ्जाषट्कमितां पञ्चतोलकसंमिते। जले संद्राव्य युञ्जीत यत्नाद्वस्तिविधानतः ॥ १६३ ॥ गुदाङ्कुरान् चिरोद्भूतान् संकोचयति सत्वरम्। रक्तं च रोधयत्यत्र गुदभ्रंशञ्च नाशयेत् ॥ १६४ ॥ तरुण्या रक्तपुष्पायाः सलिले तु परिस्रुते। पञ्चकोलोन्मिते काङ्क्षीं चतुर्गुञ्जमितां क्षिपेत् ॥ १६५ ॥ तस्याम्भसस्तु नयने द्वित्रिबिन्दून् विनिक्षिपेत्। अभिष्यन्दं निहन्त्याशु शोथपाकादिसंयुतम् ॥ १६६ ॥ स्फटिकां तोलकमितां पञ्चाशत्तोलकोन्मिते। जले विद्राव्य युञ्जीत यत्नेनोत्तरबस्तिना ॥ १६७ ॥ गर्भाशयं प्रसूतायाः सव्यथं स्थानविच्युतम्। सङ्कोचयत्याशु तथा रक्तस्रावं रुणद्धि च ॥ १६८ ॥ योनिश्च शिथिलीभूता स्वस्थानन्तु प्रपद्यते। कण्डूतिकां हन्ति तथा श्वेतप्रदरजां रुजम् ॥ १६९ ॥ रससिन्दूरसंयुक्ता स्फटी गुञ्जोन्मिताशिता। अधोगमूर्ध्वगं वापि रक्तपित्तं हरेद् भृशम् ॥ २०० ॥ रक्तिद्वयमितां कांक्षीं भक्षयेत्सितया समम्। अपक्कनागशनजं शूलं हरति दारुणम् ॥ २०१ ॥ बकुलत्वग्भवक्षोदयुक्ता तु स्फटिकारिका। घर्षिता दन्तमूलेषु दन्तदार्ढ्यकरी मता ॥ २०२ ॥ स्फटीशक्रयवोपेता गुञ्जाद्वितयसंमिता। अशिता नाशयत्याशु त्वतिसारं सुदारुणम् ॥ २०३ ॥ लवंगैलासितोपेता चूर्णिता स्फटिकारिका। दन्तेषु घर्षिता कामं नाशयेद् दन्तशर्कराम् ॥ २०४ ॥ सैन्धवं तोलकमितं स्फटिका कर्षसंमिता। दन्तेषु घर्षणादेव दन्तपैच्छिल्यमुद्धरेत् ॥ २०५ ॥
एकदशस्तरङ्गः २७७ पञ्चतोलोन्मिते तोये रक्तिपञ्चकसंमिताम् । स्फटिकां द्रावयित्वाथ कुर्वीत कवलग्रहम् ॥ २०६ ॥ नाशयेद्दन्तपैच्छिल्यं मुखपाकञ्च दारुणम् । कण्ठशुण्डीञ्च चिरमाजधिजिह्वाञ्च शोथिनीम् ॥२०७॥ अस्या आमयिकः प्रयोगः—तरुण्याः रक्तपुष्पायाः इति रक्तवर्णगुलाबपुष्प- विशेषस्येति भावः । परिस्रुते सलिले अर्के । अपि च स्फटिकद्रावः परिषेका- ज्जालकाज्जालगर्दभरोगनाशनकरश्चेत्यपि ज्ञेयम् । स्पष्टमन्यत् । स्फटिका गैरिकं च जलपिष्टं सममात्रं विषमज्वरनाशाय । मात्रा गुञ्जमिता । श्वेतस्फटिकाभस्म गुञ्जैकं द्विगुञ्जं वा अजादुग्धनिपीतं उरःक्षतशान्तिकरम् । मधुना विषमज्वरहम्, परमिदं वेगोदयाद्यामैकं प्राक् प्रयोज्यम् । स्फटिका अर्कपत्रसंस्तरचिता भस्मी- कृता ज्वरघ्नी चेति ॥ १८४–२०७ ॥ भा.टी.—मुरदाशंख को समभाग फिटकिरी में मिला बारीक चूर्ण करके व्रणों में छिड़कने से वह भरने लगते हैं । दो मासे फिटकरी को दो पल जल में घोल लें, इस जल से यदि योनि को प्रक्षालन किया जाय तो शीघ्र ही योनि की शिथिलता नष्ट हो जाती है । नकसीर अथवा नाक से रक्त निकलने पर फिटकरी को गो-दुग्ध में घोलकर नस्य लेने से नकसीर बन्द हो जाती है । सुहागा और फिटकरी समभाग में लेकर एकत्र जल में घोल लें, इस जल से सात दिन तक पुरानी विचर्चिका को धोया जाय तो निश्चय वह दूर हो जाती है । किसी स्थान में चाकू आदि शस्त्र से कट जाने पर यदि वहाँ फिटकरी चूर्ण को भर दें तो रक्त निकलना बन्द हो जाता है । तीन रत्ती फिटकरी को पांच तोले शुद्ध जल में घोलकर इस जल की गुरुदर्शित मार्ग से उत्तरबस्ति दी जाय तो सुजाक में मूत्रेन्द्रिय के अन्दर होनेवाला मेह-व्रण (जिसमें से पीप निकलती है ) अच्छा हो जाता है । एक रत्ती फिटकरी चूर्ण को मिश्री या खाँड़ के साथ जल अथवा वासास्वरस अनुपान से सेवन करने से भयंकर रक्तपित्त शान्त हो जाता है । छः रत्ती फिटकरी को पाँच तोले शुद्ध जल में घोलकर इसकी गुद- बस्ति दी जाय तो कुछ दिनों में पुराने बवासीर के मस्से सूख जाते हैं और उनसे खून निकलना बन्द हो जाता है । गुदभ्रंश ( काँच निकलना ) भी दूर हो जाता है । लाल फूल के गुलाब के अर्क ( पाँच तोला ) में चार रत्ती फिटकरी को घोलकर एक साफ शीशी में रख लें, इसमें से दो या तीन बूँद नेत्रों में डालने से आँख का दुखना, पकना, शोथ, लालिमा आदि दूर हो जाते