भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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एकादशस्तरङ्गः २७५ नेत्ररोगप्रशमनी विषमज्वरनाशिनी । रतिमन्दिरसङ्कोचकारिणी व्रणहारिणी ॥ १८२ ॥ ग्राहिणी लेखनी स्निग्धा रुधिरस्रावरोधिनी । मुखरोगहरा चैव दन्तदार्ढ्यकरी मता ॥ १८३ ॥ आचार्यैस्तु मृदुवीर्यतया प्रायो बाह्यप्रयोगाच्च शोधनमस्या उपेक्षितम् । विषमज्वरादौ भक्षणार्थन्तु श्वेतायाः स्फटिकारिकायाः शोधनं विधेयमेवेति ॥ १८२-१८३ ॥ भा.टी.—फिटकरी रस में कषाय, कटु (कुछ चरपरी), तिक्त (कुछ कड़वी, और गुण में गरम होती है । यह प्रायः सब विषदोषों को दूर करती है । इसी वास्ते यह वीसर्प-कण्डू रोगों को दूर करती है । इसके प्रयोग से बाल सुन्दर और दृढ़ होते हैं । सफेद कोढ़ में यह लाभ करती है और व्रणों को भरने के काम आती है । नेत्र रोगों में इसका प्रयोग (बाह्य) लाभ पहुँचाता है । इसके सेवन से विषमज्वर नहीं चढ़ता है । यह ग्राही और लेखन है । स्पर्श में स्निग्ध होती है । शरीर के किसी स्थान से निकलनेवाले रक्तस्राव को रोकती है । मुख के क्षतपाकादि रोगों को बाह्य प्रयोग से दूर करती है । दाँतों में मलने से उनको दृढ़ बनाती है ॥ १८१-१८३ ॥ अस्या आमयिकः प्रयोगः मृहारशृङ्गसंयुक्तां चूर्णितां स्फटिकारिकाम् । व्रणेऽवचूर्णयेन्नित्यं रोपणं जायते परम् ॥ १८४ ॥ माषकद्वयमितां तु रङ्गदां निक्षिपेद् द्विपलसंमिते जले । क्षालयेदथ मनोजमन्दिरं नाशयेच्छिथिलतां क्षणादलम् ॥ १८५ ।' स्फटिका गव्यपयसा शीलिता नस्ययोगतः । निहन्ति रुधिरस्रावं नासिकायाः सुदारुणम् ॥ १८६ ॥ सौभाग्यचूर्णसंयुक्तां स्फटिकां निक्षिपेज्जले । द्रवीभूतां ततो ज्ञात्वा क्षालयेत्तेन वारिणा ॥ १८७ ॥ विचर्चिकां चिरोद्भूतां स्राविणीमपि निर्भराम् । दिनसप्तकमात्रेण नाशयेदिह निश्चितम् ॥ १८८ ॥ माषोन्मिता स्फटी तूर्णं चूर्णिता त्ववचूर्णिता । रोधयेद्रुधिरस्रावं सद्य क्षतसमुद्भवम् । १८६ ॥ स्फटीं रक्तित्रयमितां पञ्चतोलकसंमिते । सलिले द्रावयित्वाथ यत्नादुत्तरबस्तिना ॥ १६० ॥