भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२६८ रसतरङ्गिणी मल्लो बाह्यप्रयोगेण क्षारकर्मकरः परम् । शोथसन्तापशैथिल्यकरश्च परिकीर्तितः ॥१४४॥ अथास्य गुणाः—स्निग्धः स्पर्शतः । अवशिष्टगुणनिर्देशः प्रायः प्राचीनरस- तन्त्रानुक्तोऽनुभूतचरश्चेति ध्येयम् । एवमग्रेऽपि । बाह्यप्रयोगे च क्षारकर्म दारण- भेदनादि तत्करोतीति ॥ १३८–१४४ ॥ भा.टी.—संखिया स्पर्श में स्निग्ध (चिकना), दोषनाशक और पारद का बन्ध करनेवाला लिखा है। यह कफ वायु के सब रोगों को नष्ट करता है और बिच्छू आदि के विष को नष्ट करता है। यदि शुद्ध संखिया एक मास तक उप- युक्त विधि से सेवन किया जाय तो इससे भयंकर श्वास रोग तथा अनेक प्रकार के कुष्ठ निःसन्देह नष्ट हो जाते हैं। इसके प्रयोग से श्लीपद (पीलपाँव) रोगजन्य ज्वर नष्ट होता है और कामशक्ति बढ़ जाती है। यह सन्धिवात (गठिया) को नष्ट करता और फिरङ्ग का शत्रु तथा अग्निमान्द्य को दूर करने में सर्वोत्तम द्रव्य है। विषमज्वर को समूल नष्ट करता, शरीर की कान्ति को बढ़ाता और पुरानी रक्ताल्पता को दूर करता है। अत्यन्त पुराने भयंकर प्रतमक श्वास को नष्ट करता है। यदि राजयक्ष्मा की आरम्भिक अवस्था में प्रयोग किया जाय तो उसे भी नहीं बढ़ने देता है। हृदयशूल जन्य ज्वरजन्य हृदय की दुर्बलता को शीघ्र ही दूरकर देता है। भोजन के बाद ही प्रतिदिन होनेवाले दस्तों में यह शीघ्र ही आराम देता है। यदि इसे बाह्य प्रयोग में काम लाया जाय तो इसका स्थानिक प्रभाव क्षारों के सदृश होता है। अर्थात् बाह्य प्रदेश के शोथ और सन्ताप उष्णताको शीघ्र ही कम कर देता है ॥ १३८–१४४ ॥ वक्तव्य—संखिया और हरतालभस्म के गुण प्रायः सदृश ही होने से इनका एक जैसा ही प्रभाव समझना चाहिये। सोमल का निष्क्रमण अधिक मात्रा में मूत्र तथा मल द्वारा होता है और अल्प मात्रा में पित्ताशय से पित्त तथा त्वचा के स्वेद और मुख की लाला द्वारा भी होता है। इसी प्रकार अश्रुओं और स्तन्य द्वारा भी यह निकलता है। अतः सोमल या सोमलयुक्त औषधि का सेवन बन्द करने पर भी यह तीन सप्ताह तक शरीर में पाया जाता है। शङ्खविषस्य मात्रानिरूपणम् खनेत्रेन्दुमिताद् भागाद् रक्तेरारभ्य यत्नतः । खवह्निभागप्रमितं शङ्खमूषं नियोजयेत् ॥१४५॥ अथास्य मात्रा—गुञ्जायाः १२० तमभागा ( १/१२० र० )—दारभ्य ३० तम-