रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशस्तरङ्गः २६७ का स्वरस डालकर उसमें दिन भर मन्द-मन्द अग्नि से पकायें तो संखिया शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध संखिया को सावधानी से काम में लावें ॥१३३-१३४ मल्लशोधनस्य द्वितीयः प्रकारः मल्लचूर्णं त्वाजरसैर्दोलायन्त्रे विपाचयेत् । दिनैकन्तु विधानज्ञो मल्लः शुद्धिंमवाप्नुयात् ॥१३५॥ भा.टी.—मल्ल के चूर्ण को पोटली में बांधकर बकरी के दूध अथवा मांस रस में दोला यन्त्र द्वारा एक दिन पकाने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ १३५ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः कारवेल्लीरसेनेह दोलायन्त्रे दियामकम् । विपाचितं शङ्खविषं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥१३६॥ भा.टी.—संखिया को उक्तविधि से करेले के पत्ररस में दोलायन्त्र द्वारा पका लेने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ १३६ ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः विपाचितं शङ्खविषं यत्नतष्टङ्कणाम्भसा । गव्यदुग्धेन वा यामं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥१३७॥ भा.टी.—संखिया को सुहागे के जल अथवा गोदुग्ध में दोलायन्त्र द्वारा पका लेने से भी वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ १३७ ॥ विशुद्धमल्लस्य गुणाः गौरीपाषाणकः स्निग्धो दोषघ्नो रसबन्धकृत् । कफवातामयहरः वृश्चिकादिविषप्रणुत् ॥१३८॥ मासमात्रप्रयोगेण श्वासं परमदारुणम् । विविधानि च कुष्ठानि नाशयेन्नैव संशयः ॥१३९॥ श्लीपदोत्थज्वरध्वंसी प्रकामं कामवर्धनः । सन्धिवातगदद्वेषी फिरङ्गकरिकेशरी ॥१४०॥ अग्निमान्द्यहरः कामं विषमज्वरनाशनः । कान्तिप्रदः परं जीर्णपाण्डुरोगनिषूदनः ॥१४१॥ श्वासं प्रतमकं हन्ति चिरोत्थं त्वतिदारुणम् । द्रुतमारम्भवेलायां यक्ष्माणमपि नाशयेत् ॥१४२॥ हृच्छूलजं ज्वरोत्थञ्च हृद्दौर्बल्यं द्रुतं हरेत्। अतीसारं निहन्त्याशु मुक्तमात्रसमुत्थितम् ॥१४३॥