रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ रसतरङ्गिणी स्वर्णबीजं कणा शुण्ठी पृथङ् माषद्वयोन्मितम् । आदाय खल्वे संमर्द्य त्रिदिनं निम्बुकाम्बुना ॥१६४॥ निर्मापयेन्निजान्वक्षं वटिका रक्तिकोन्मिताः । एकैकां वटिकां दद्याद् द्विवारं दिवसे भिषक् ॥१६५॥ नामतस्तु समाख्यातो रसः शङ्खविषोदयः । भूतज्वरहरः कामं सन्निपातकुलान्तकः ॥१६६॥ अथ शङ्खविषोदयः—स्वर्णबीजं धत्तूरबीजम्, निजान्वक्षं स्वप्रत्यक्षम्, वटि- कानिर्माणं परिचारकसावधानतार्ज्ञार्थम् । भूतज्वरो विषमज्वरः ॥ १६६ ॥ भा.टी.—शुद्ध सोमल एक रत्ती, कालीमिर्चचूर्ण तीन मासा, रससिन्दूर तीन मासा, शुद्ध धतूराबीज, पिप्पलीचूर्ण प्रत्येक दो-दो मासा लेकर सब को खरल में एकत्र करके निम्बू के स्वरस में तीन दिन तक अच्छी तरह मर्दन करके एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें । इनमें से एक गोली सुबह और एक गोली शाम को सेवन करायें । इसको शंखविषोदय-रस कहते हैं । यह रस विषमज्वर तथा सन्निपातज्वर को नष्ट करता है ॥ १६३-१६६ ॥ अथ चण्डेश्वरो रसः गुञ्जोन्मितं शङ्खविषं यत्नतो विमलीकृतम् अमृतं सुमृतं ताम्रं पृथङ् माषद्वयोन्मितम् ॥१६७॥ श्लक्ष्णपिष्टा कज्जलिका कलामाषकसंमिता । भावयेत्सप्तवारं तु शृङ्गवेरोत्थवारिणा ॥१६८॥ निर्गुण्डीस्वरसेनाथ तथैव खलु भावयेत् । निर्मापयेन्निजान्वक्षं वटिका रक्तिकोन्मिता ॥१६९॥ रसज्ञैः कीर्तितोऽयं तु नाम्ना चण्डेश्वरो रसः । विशेषतः समाख्यातो विविधज्वरनाशनः ॥१७०॥ अथ चण्डेश्वरः—अमृतं वत्सनाभः । कजली १६ माषप्रमिता ॥१६७-१७०॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ संखिया एक रत्ती, शुद्धवत्सना- भविष और शुद्धताम्रभस्म दो-दो मासे, पारदगन्धक की समभाग कजली सोलह मासे लेकर इनको एकत्र खरल में अदरखरस की सात भावना और निर्गुण्डी ( सम्भालु ) स्वरस की सात भावना देकर एक-एक रत्ती की गोली बना लें । यह योग चण्डेश्वररस नाम से कहा जाता है । यह रस अनेक प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है ॥ १६७-१७० ॥