रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदिकः स्मृतः" इत्युक्तलक्षणम् । अमलः निर्मल, सम्मलः शंखविषम् । अथ प्रसङ्गादस्य बाह्यान्तः प्रयोगार्थं शङ्खविषद्रावः—विशुद्धयवक्षारः ८७½ ग्रेनमितः, शङ्खविषं ८७½ ग्रेनमितम् जलं २० औन्समितं यावत् इति परिभाषा नवीनत- न्त्रोक्ता ज्ञेया । युवयोग्या मात्रास्य द्वित्रा बिन्दवः । सार्द्धकर्षमिते जले सन्द्राव्य प्रयोज्या । योगोऽयं लेपद्वारा मषकादिषु क्षारकर्मकर इति ॥ १५३-१६३ ॥ भा.टी.—वासासत्व अथवा छोटी कटैलीचूर्ण के साथ मल्ल का सेवन करने से भयंकर पुराना श्वास नष्ट होता है । विविध प्रकार के कुष्ठों में इसको पञ्चतिक्तों के सत्त्व अथवा चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन कराना चाहिये । श्लीप- दज्वर को नष्ट करने के लिये इसको गिलोय तथा आक की जड़ के चूर्ण के साथ सेवन कराना चाहिये । करञ्जबीजचूर्ण के साथ संखिया मिलाकर खिलाने से एक ही दिन में विषमज्वर को रोक देता है । आमवात और आमवातिक ज्वर में संखिया को सोंठ और पुनर्नवाचूर्ण के साथ तीन दिन सेवन कराने से उसमें आराम आ जाता है । संखिया को लोहभस्म में मिलाकर त्रिफलाक- षायानुपान से सेवन करने पर पुरातन पाण्डुरोग नष्ट हो जाता है । जावित्री और लौंगचूर्ण के साथ सोमल मिलाकर सेवन करने से भयंकर और पुराना फिरंग रोग नष्ट हो जाता है । राजयक्ष्मा में इसको रससिन्दूर और लोहभस्म में मिलाकर सेवन कराया जाता है । शंखपुष्पीचूर्ण में मिला संखिया का सेवन कराने से हृदय की दुर्बलता दूर होती है । भोजन करने के बाद तुरन्त ही होने वाले अतीसार में सोमल को सोंठ और मरिचचूर्ण में मिलाकर सेवन करने से आराम आता है । बिच्छू के दंशस्थान में संखिया जल में घिसकर लेप करने से शीघ्र बिच्छू का विष उतर जाता है ॥ १५३-१६२ ॥ वक्तव्य—हरतालभस्म अथवा सोमलभस्म सेवन काल में रोगी को लवण तथा कटुरस और उष्णगुण भोजन नहीं करना चाहिये । यदि रोगी लवणरस त्याग न कर सके तो उसे बहुत थोड़ी मात्रा में सेन्धानमक सेवन कराया जा सकता है । इसके अतिरिक्त सोमलसेवन-काल में अग्निताप तथा धूप में घूमना भी हानिकारक होता है । अथ शङ्खविषोदयरसः गुञ्जोन्मितं शङ्खविषं यत्नतो विमलीकृतम् । मरिचं रससिन्दूरं पृथङ् माषत्रयोन्मितम्॥१६३॥