रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशस्तरङ्गः २७६ २—गौरखटी (सफेद खड़िया); इनमें से खटी कुछ मैली होती है, किन्तु गौर- खटी सफेद और कोमल होती है ॥ २०६ ॥ खटिकायाः शोधनम् खटीचूर्णं शुद्धपात्रे निधाय बिमले जले । प्रक्षालयेद्विधानज्ञो विशुध्यति न संशयः ॥ २१० ॥ विमलजले शोधनं पाषाणांशनिरासाय सुधाचूर्णांशनिरासद्वारा भक्षण- योग्यतासम्पादनाय च ॥ २१० ॥ भा.टी.—खड़िया के चूर्ण को एक स्वच्छ पात्र में डालकर शुद्ध जल में अच्छी तरह घोलकर उसको वस्त्र से छान लें और धूप में सुखाकर रख लें तो खड़िया शुद्ध हो जाती है ॥ २१० ॥ खटिकाया गुणाः खटिका शिशिरा तिक्ता मधुरा शोथनाशिनी । पित्तप्रशमनी कामं विविधव्रणरोपणी ॥ २११ ॥ कफदाहास्रदोषघ्नी नेत्रामयनिषूदिनी । हरिद्वर्णातिसारघ्नी स्वेदादिस्रावहारिणी ॥ २१२ ॥ हरिद्वर्णातिसारघ्नी बालकेषु प्रायः, मधुरा शतपुष्पा ॥ २११–२१२ ॥ भा.टी.—खटिका, शीत, तिक्त, मीठी, शोथ को दूर करनेवाली, पित्त शामक, अनेक रोगों को दूर करनेवाली, कफ, दाह, रक्त के दोषों को दूर करने वाली, नेत्र रोगों को विनाश करनेवाली, हरे रंग के अतीसार रोग को और पसीना आने को रोकनेवाली है ॥ २११–२१२ ॥ खटिकाया आमयिकः प्रयोगः माषोन्मितं खटीचूर्णं भक्षितं शीतवारिणा । प्रवाहिकाञ्च पित्तास्रं ग्रहणीञ्च विनाशयेत् ॥ २१३ ॥ खटी शुद्धा मधुरिकातोयेन सितयान्विता । शीलिता विनिहन्त्याशु त्वतीसारं सुदारुणम् ॥ २१४ ॥ भा.टी.—एक मासा खड़ियाचूर्ण को शीतल जल से सेवन करने पर प्रवाहिका, रक्तपित्त तथा ग्रहणी रोग में लाभ होता है । शुद्ध खड़िया को मिश्री मिलाकर अर्कसौंफ के साथ खिलाने से शीघ्र ही भयंकर अतीसार शान्त हो जाता है ॥ २१३–२१४ ॥