भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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२८० रसतरङ्गिणी अथ चूर्णस्य नामानि चूर्णं चूर्णकचूर्णान्तु सुधा सौधविलेपनम् । तदेव च समाख्यातं शिलाक्षारं भिषग्वरैः ॥ २१५ ॥ चूर्णं, चूर्णक, सुधा, सौधविलेपन और शिलाक्षार, ये नाम वैद्यों ने चूने के कहे हैं ॥ २१५ ॥ चूर्णोदकस्य निर्माणप्रकारः रक्तिद्वयोन्मितं चूर्णं पञ्चतोलकसंमिते । जले विनििक्षिपेत्प्राज्ञस्त्रियामं स्थापयेद् बुधः ॥ २१६ ॥ ततः सारकपत्रेण सारयेत्काचपात्रके । चूर्णोदकमिति ख्यातं तथैव च सुधोदकम् ॥ २१७ ॥ चूर्णोदकं दृढहरितकाचकुप्यां निधापयेत् । तथातिमंयतेनेह पिधानेन निरोधयेन् ॥ २१८ ॥ अथ चूर्णकम्—तस्य प्रयोगार्थे चूर्णोदकनिर्माणप्रकारः-सारकपत्रं "Filter Paper" इत्याङ्गलभाषायाम्। दृढहरितकाचकुप्यां निधानं सूर्यकिरणसम्पर्का- दौषधगुणक्षयभयात् ॥ २१६-२१८ ॥ भा.टी.—दो रत्ती साफ चूने की डली को पाँच तोले शुद्ध जल में डाल- कर बारह घंटे पड़े रहने दें। इसके बाद इस जलको सारकपत्र (Filter Paper) से काँच के पात्र में छान लें। इस छुने हुए जल को चूर्णोदक सुधोदक (चूने का पानी) कहा जाता है। चूनेके जल को एक दृढ़ हरे रंग की शीशी में रखकर उसमें अच्छी तरह डाट लगा देना चाहिये। वक्तव्य—चूने के पानी को खुला और सफेद शीशी में रखने से सूर्य- किरणों से वह अल्पशक्ति हो जाता है ॥ २१६-२१८ ॥ चूर्णोदकस्य गुणाः चूर्णोदकं कृमिहरमतीसारहरं परम् । अम्लपित्तप्रशमनं विशेषाद्दुग्धपाचनम् ॥ २१६ ॥ शूलं ग्रहणिाकां हान्त खटीवद् गुणकारकम् । द्रावकाशनसम्भूतां निहन्ति च विषक्रियाम ॥ २२० ॥ द्रावकाः गन्धकद्रावादयः, तद्भक्षणजाताम् ॥ २१६-२२० ॥ भा.टी.—चूने का पानी बाह्याभ्यन्तर प्रयोग में कृमिनाशक और अतिसार- शामक है। अम्लपित्त रोग में लाभ पहुँचाता है। जिन बालकों को दूध नहीं