भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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एकादशस्तरङ्गः २८१ पचता हो उन्हें इसके देने से दूध पचने लगता है। यह उदरशूल और ग्रहणी को नष्ट करता है और खड़िया के समान ही गुणकारक है। गन्धक-द्राव (Sul- phuric acid) के विषैले लक्षणों को यह शान्त कर देता है ॥२१६-२२०॥ चूर्णोदकस्य मात्रा आरभ्य त्रिंशद्बिन्दुभ्यः षष्टिबिन्दुमितं परम् । चूर्णोदकं प्रयुञ्जीत वार्षिकैकस्तनन्धये ॥ २२१ ॥ चूर्णोदकस्य सुखदा तोलकद्वयसंमिता । पूर्णमात्रा समाख्याता रसतन्त्रविशारदैः ॥ २२२ ॥ भा.टी.—एक वर्ष की आयु के बालक को यदि चूने का पानी देना हो तो तीस बूँद से लेकर साठ बूँद तक इसको दे सकते हैं। इसकी पूर्णमात्रा रसशास्त्रज्ञों ने दो तोला निर्धारित की है ॥ २२१-२२२ ॥ चूर्णोदकस्य आमयिकः प्रयोगः यत्नादिह हि वस्त्युक्तविधानेन सुधोदकम् । योजितं विनिहन्त्याशु कृमीन् क्षुद्रान्त्रसंस्थितान् ॥ २२३ ॥ नवसादरसंयुक्तं चूर्णं लिप्तं तु वारिणा । व्यथां वृश्चिकदंशोत्थां नाशयेदविलम्बितम् ॥ २२५ ॥ विषपीते सुधातोयं योजितं त्वविलम्बितम् । मल्ल भक्षणसंभूतां विनिहन्ति विषक्रियाम् ॥ २२४ ॥ सुधोदकं दुग्धयुतं प्रत्यहं परिशीलितम् । अम्लपित्तं निहन्त्याशु विशेषादविलम्बितम् ॥ २२६ ॥ कवलग्रहमार्गेण योजितं तु सुधोदकम् । विनिहन्त्यचिरादेव मुखपाकक्षतादिकम् ॥ २२७ ॥ चूर्णोदकं कर्षमितं काचपात्रे निधापयेत् । तन्मितञ्चातसीतैलं दत्त्वा काचशलाकया ॥ २२८ ॥ क्षणं प्रचाल्य मतिमान् काचकुप्यां तु विन्यसेत् । अग्निदग्धोत्थदाहघ्नं परमेतद्विलेपनात् ॥ २२६ ॥ चूर्णोदकस्य बालकेषु प्रयोगो दन्तोद्भेदजातरोगेषु स्पष्टमन्यत् । २२३-२२६। भा.टी.—यदि सावधानी के साथ बस्तिविधान से चूने के जल को प्रयुक्त किया जाय तो गुदा और क्षुद्रान्त्र के कृमि नष्ट हो जाते हैं। बिच्छू के काटे हुए स्थान पर चूने के जल में नौसादर घोलकर लेप करने से बिच्छू का जहर उतर