भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२८२ रस्तरङ्गिणी जाता है । यदि संखिया विष खाने पर शीघ्र ही चूने का पानी पिला दिया जाय तो शीघ्र ही विष का प्रभाव नष्ट हो जाता है । चूने के पानी को दूध में मिलाकर पिलाने से शीघ्र अम्लपित्त रोग शान्त हो जाता है । मुखपाक, क्षत, आदि कष्टों में चूने के जल का कुल्ला करने से शीघ्र आराम आ जाता है । चूने के एक तोला पानी को काँच के पात्र में डालकर उसमें उतना ही अलसी का तैल मिला एक काँच की सलाई से थोड़ी देर तक चलाकर जब वह गाढ़ा सफेद लेप सा बन जाय तो एक काँच की शीशी में रख लें । अब इसे अग्निदग्ध स्थान में लगायें तो दाह शान्त हो जाता है ॥ २२३-२२६ ॥ अथ दुग्धपाषाणस्य नामानि दुग्धपाषाणको दुग्धी दुग्धपाषाणिका तथा । दुग्धा दुग्धशिला चैव क्षीरी क्षीरत्तवश्च सः ॥ २३० ॥ वज्राभो दीप्तिकश्चापि सौधो गोमेदसन्निभः । दुग्धोपलो दुग्धदृषद् भिषग्भिः परिकीर्तितः ॥ २३१ ॥ दुग्धपाषाण, दुग्धी, दुग्धपाषाणिका, दुग्धा, दुग्धशिला, क्षीरतत्व, वज्राभ, दीप्तिक, सौध, गोमेदसन्निभ, दुग्धोपल, दुग्धदृषद, ये सब नाम दुग्धपाषाण ( शंखजराहत ) के हैं ॥ २३०-२३१ ॥ दुग्धपाषाणस्य गुणाः दुग्धोपलस्तु मधुरस्त्वीदुष्णो ज्वरापहः । पित्तप्रशमनः कामं त्वग्दाहाध्माननाशनः ॥ २३२ ॥ हृदामयहरो रुच्यः पित्तशूलविनाशनः । कासश्वासहरश्चैव समाख्यातो भिषग्वरैः ॥ २३३ ॥ भा.टी.-दुग्धपाषाण रस में मधुर और गुण में कुछ गरम होता है । यह ज्वरनाशक और पित्तशामक, त्वचा के दाह और उदराध्मान को दूर करता है । हृदयरोगों में लाभदायक, रुचिकारक, पित्तप्रकोपजन्य शूल तथा कास-श्वास रोगों में आराम देता है ॥२३२-२३३ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः दुग्धपाषाणिका शुभ्रा यवक्षारसमन्विता । प्रलेपिता तु सततं कुष्ठं सिध्माभिधं हरेत् ॥ २३४ ॥ दुग्धपाषाणजं चूर्णं शीलितं गुञ्जसंमितम् । हन्ति ज्वरं मन्दवेगं सायंकालसमुत्थितम् ॥ २३५ ॥