रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशस्तरङ्गः २८७ शिला मरीचद्विगुणा शंखो माषाष्टकोन्मितः ॥१२॥ सम्पेष्य वर्तिकां कृत्वा लोचने विधिनाञ्जयेत् । तिमिरं नाशयेद्वारा मस्तुना चार्बुदं हरेत् ॥१३॥ पिच्चटं मधुना हन्यान्नारीस्तन्येन चार्जुनम् । त्रिरेखवर्तिका ह्येषा नेत्रामयनिषूदनी ॥१४॥ शुद्धशङ्खस्य बाह्यप्रयोगों नेत्रहितकारी—कृष्णा पिप्पली, शिला मनःशिला, वारा जलेन। पिच्चटं नेत्ररोगविशेषम्। अर्जुनं तदाख्यनेत्रव्याधिम् ॥ १२-१४ ॥ भा. टी.—पिप्पलीचूर्ण एक मासे, कालीमिर्चचूर्ण दो मासे, शुद्ध मैन- सिल चार मासे, शुद्ध शंखचूर्ण आठ मासे लेकर, इन सब को एकत्र खरल में जल से पीसकर बत्ती बनालें। इन बत्तियों को आँखों में आञ्जने से अर्थात् जल में घिस कर आँखों में लगाने से तिमिर (मोतियाबिन्द) रोग नष्ट होता है। दही के जल में घिसकर आंजन से नेत्रार्जुन (नाखूना) रोग दूर होता है। यह नेत्ररोगों को नष्ट करने वाली त्रिरेखवर्तिका कही जाती है ॥१२-१४ ॥ अर्जुनहरशङ्खचूर्णम् विशोधितं शङ्खचूर्णं क्षौद्रेण तु समन्वितम् । अर्जुनं नाशयत्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥१५॥ भा.टी.—शुद्ध शंख चूर्ण को मधु के साथ आँख में लगाने से—जैसे सूर्य के प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता है उसी प्रकार इस अञ्जन से रोग नष्ट हो जाता है ॥ १५ ॥ शंखवर्तिः शङ्खसैन्धवडिण्डीरैः शिग्रुबीजैश्च निर्मिता । वर्तिर्नेत्रेऽञ्जनादेव शुक्रादीन्नाशयत्यलम् ॥ १६ ॥ भा.टी.—शुद्धशंखचूर्ण, सेंधानमक, समुद्रफेन और सहंजन के बीज-चूर्ण को एकत्र जल से घोट कर वर्ति बना लें। इस वर्ति को आँखों में आँजन से नेत्र का फूला आदि नष्ट हो जाता है ॥ १६ ॥ अथ शंखस्य मारणम् शुद्धशङ्खस्य खण्डानि शरावे स्थापयेत्सुधीः । शरावेण पिधायाथ यत्नत्सन्धिं प्रलेपयेत् ॥ १७ ॥ आतपे त्वथ संशोष्य पुटेद् गजपुटे भिषक् ।