रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ रसतरङ्गिणी स्वतःशीतं समुद्धृत्य खल्वे सञ्चूर्णयेद्भिषक् ॥ १८ ॥ चूर्णितञ्चाथ विज्ञाय सम्पुटस्थं ततः पुटेत् । एवं पुटद्वयेनैव शङ्खो मृतिमाप्नुयात् ॥ १६ ॥ भा. टी.—शुद्ध किये हुए शंख के टुकड़ों को एक प्याले या सिकोरे में रख कर उस पर दूसरा प्याला या सिकोरा औंधा रखकर इनको सन्धिलेप कर दें और धूप में सुखा दें। अब इस सम्पुट को गजपुट में रख कर फूँक दें। स्वांगशीतल होने पर सम्पुट में से शंख के अर्धदग्ध टुकड़ों को निकाल खरल में चूर्ण करके पुनः गजपुट में रख कर फूक दें। इस प्रकार दो बार गजपुट में फूकने से शंख की भस्म हो जाती है ॥ १७–१६ ॥ अथ मृतशंखस्य गुणाः, मात्रा च शङ्खः सुशीतलः क्षारस्वम्लपित्तविनाशनः । अग्निमान्द्यहरो बल्यो ग्राही ग्रह्णिीकाहरः ॥ २० ॥ परिणामोत्थशूलघ्नस्तारुण्यपिडिकापहः । विषदोषहरो वर्ण्यो मात्रा गुञ्जाद्वयोन्मिता ॥ २१ ॥ अथास्य गुणाः—क्षारः आस्वादतः कर्मतश्च ॥ २०–२१ ॥ भा. टी.—शङ्ख स्पर्श में शीतल, क्षारीय प्रकृति और अम्लपित्तनाशक है। यह बलवर्धक तथा ग्राही है, ग्रहणी रोग और परिणामशूल आदि रोगों को नष्ट करती है। युवावस्था में निकलनेवाली फुंसियों (मुँहासे) को मिटाती है। शंखभस्म ग्राही अर्थात् स्तम्भन होने से अतिसार विशेषतः पक्वातिसार में अत्यन्त उपयोगी है। शंखभस्म की मात्रा दो रत्ती समझनी चाहिये ॥ २०–२१ ॥ मृतशंखस्य आमयिकः प्रयोगः निम्बूकरस्वरसेनेह मृतशंखस्तु शीलितः । अतिसारं हरेत्तूर्णं ग्रहणीञ्चातिदारुणाम् ॥ २२ ॥ सत्र्यूषणो मृतः शंखस्त्वग्निमान्द्यं व्यपोहति । धात्रीचूर्णेन संयुक्तस्त्वम्लपित्तं विनाशयेत् ॥ २३ ॥ यवक्षारत्रिकटुना गुल्मरोगहरः परम् । शूलं त्रिदोषजं हन्याद् व्योषसैन्धवह्विङ्गुना ॥ २४ ॥ पुरातनगुड़ोपेतस्त्वथवा व्योषसंयुतः । सपञ्चलवणः शंखः परिणामोत्थशूलनुत् ॥ २५ ॥