भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३०६ रसतरङ्गिणी वारा जलेन अञ्जनात् इति अन्वयः । कालेयकः पीतचन्दनम् । उत्पत्ति- वर्णनं फेनत्वेन भ्रमवारणाय । स्पष्टमन्यत् ॥११५-१२३॥ भा.टी.—समुद्रफेनचूर्णं को समभाग सफेद खाँड़ के साथ बारीक पीसकर आँखों में आँजने से पुराना फूला (Opecity) मिट जाता है । समुद्रफेन को शंखचूर्ण और सैन्धानमक के साथ बारीक पीस कर ताँवे की सलाई से आँखों में लगाने से नेत्र फूला आदि शस्त्रसाध्य व्याधियों को शस्त्र की भाँति ही काट कर साफ कर देता है । पिप्पलीचूर्ण और सैन्धानमकचूर्ण के साथ समुद्रफेन को बारीक कर मधु में मिला आँखों में अंजन करने पर पुराना नेत्रफूला कट जाता है । पोथकी (कुकरे) के लिये, समुद्रफेन एक भाग, शुद्धतूतिया ३/८ भाग, हरीतकीचूर्ण ३/८ भाग लेकर इनको जल से पीस कर वर्ति बना इसको आँखों में अंजन के रूप में लगाया जाता है । राल, सैन्धानमक, रसौत और समुद्रफेन, प्रत्येक समभाग लेकर जल से पीस गोली बना लें । इन गोलियों को जल में घिस कर आँखों में अञ्जन करने से क्लिन्नवर्त्म रोग दूर होकर पलकों में बाल उगने लगते हैं । समुद्रफेन को बारीकचूर्ण कर एक नली से कान में फूँक देने से पुराना कान का बहना शीघ्र बन्द हो जाता है । पारदगन्धक की सम- भाग कजली अथवा शुद्ध हिंगुल के साथ समभाग समुद्रफेन मिलाकर अन्तः- प्रयोग करने से कफपित्तज्वर नष्ट होता है । व्रणों को भरने के लिए मुरदासंख और समुद्रफेन को समभाग में लेकर एकत्र चूर्ण कर लें, इसको शहद में मिला कर व्रणों पर लगाना चाहिये । शुक्र धातु की शुद्धि के लिए समुद्रफेनचूर्ण को तालमखाना, सफेदचन्दन, कायफल, खस और गन्ने की जड़ के कषाय के साथ अथवा इनके चूर्णके साथ सेवन कराया जाता है ॥ ११५-१२३ ॥ अब्धिफेनस्य उत्पत्तिस्थानम् समुद्रे वर्तुलः क्षुद्रो दशहस्तसमन्वितः । मीनजातिसमुत्पन्नो जन्तुरेको विलक्षणः ॥१२४॥ भीषणाक्षः कूर्मपृष्ठः स यदा विजहात्यसून् । तत्पृष्ठास्थि विशुष्कन्तु सुनाभं दृश्यते तदा ॥१२५॥ अब्धिमध्ये तरत्येतत्तरङ्गैराहतं मुहुः । यतोऽब्धौ फेनवत्तारि त्वब्धिफेनं ततः स्मृतम् ॥१२६॥ इति शङ्खादिविज्ञानीयो नाम द्वादशस्तरङ्गः