भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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३०८ रसतरङ्गिणी अब इस ( राख ) को एक स्वच्छ पात्र में डालकर उसमें राख से आठ गुना जल डालकर हाथ से अच्छी तरह मसलें और एक मोटे गाढ़े कपड़े से इस पानी को छानकर पृथक् करलें । अब सात बार छाने हुए इस स्वच्छ जल को एक स्वच्छ पात्र में डालकर अग्नि में पकायें, जब पानी जल जायगा तो पात्र के तल में लगे हुए पाण्डुरप्रभं (कुछ पीला सफेद) यवक्षार को खुरचकर निकाल लें ॥३-५॥ यवक्षारस्य गुणाः यवक्षारो लघुः स्निग्धो दीपनः पाचनः परम् । गुल्मप्लीहामयहरः कफहा वातनाशनः ॥ ६ ॥ शूलानाहोदराध्मानमूत्रकृच्छ्रप्रणाशनः । कण्ठामयहरो हृद्यश्चाम्लपित्तहरः सरः ॥ ७ ॥ औपसर्गिकमेहोत्थफलशोथ निवारणः । स्वेदप्रवर्त्तकश्चैव भिषग्भिर्मूत्रलो मतः ॥८॥ अथ गुणाः-लघुः पाकतः, स्निग्धः स्नेहद्रव्यगुणयोगी । पूयमेहे जातमण्ड- शोथं विनाशयति ॥ ६-८ ॥ भा.टी.—यवक्षार शीघ्र पच जाने से लघु और स्निग्ध, दीपन और पाचन होता है । यह गुल्म प्लीहा को नष्ट करता है, कफ को पतला निकालता है और कोष्ठ में वातप्रकोप (अवरोध) को शान्त करता है । इसके अतिरिक्त उदर- शूल, अफरा, मूत्रकृच्छ्र, गले के रोग ( कण्ठशुण्डी, गलग्रन्थिशोथ आदि ) में लाभदायक, हृद्य, अम्लपित्त में पित्त को उदासीन कर उसको शांत करनेवाला और आन्त्रगतिप्रेरक ( सर ) है । सुजाकरोग के कारण अण्डकोषों में होने वाली सूजन को मिटाता है । स्वेदवाहिनियों को उत्तेजित कर अधिक पसीना लानेवाला और वृक्कों को उत्तेजित कर अधिक मूत्र लानेवाला है ॥ ६-८ ॥ यवक्षारस्य मात्रा आरभ्य रक्तिन्त्रितयाद् दशरक्तिकसंमितम् । यवक्षारं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥६॥ ३ गुञ्जातः १० गुञ्जापर्यन्तं मात्रास्य ॥ ६ ॥ भा.टी.--तीन रत्ती से लेकर दस रत्ती तक बल, काल, देश आदि को देखकर यवक्षार की मात्रा निर्धारित करनी चाहिये ॥ ६ ॥ यवक्षारस्य आमयिकः प्रयोगः चूर्णितो यवजक्षारो निपीतस्तूष्णवारिणा ।

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