रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ रसतरङ्गिणी अथ टङ्कणस्य नामानि टङ्कणष्टङ्कनश्चैव टङ्कष्टङ्गश्च टङ्गणः। द्रावकष्टङ्कणक्षारष्टङ्कक्षारश्च कथ्यते ॥ ७२ ॥ रंगक्षारस्तथा रंगो रंगदो लोहशोधनः। लोहशोधनकश्चापि कीर्तितः स्वर्णशोधनः ॥ ७३ ॥ सौभाग्यश्च सितक्षारः श्वेतक्षारश्च टंककः। क्षारराजश्च कथितो रसायनविशारदैः ॥ ७४ ॥ अथ टङ्कणः—टङ्कणनामानि तन्त्रे व्यवहार्याणि, कानिचिद् गुणरूपनिर्देश- कराणि चेति ॥ ७२–७४ ॥ भा.टी.—टंकण, टंकन, टंक, टंग, टंगण, द्रावक, टंकणक्षार, रंगक्षार, रंग, रंगद, लोहशोधन, स्वर्णशोधन, सौभाग्य, सितक्षार, श्वेतक्षार, टंगक, क्षारराज, ये सब नाम रसशास्त्रियों ने सुहागे के बताये हैं ॥ ७२–७४ ॥ टङ्कणस्य निर्मलीकरणम् टङ्कणं चूर्णितं तोये तत्त्वसङ्ख्यगुणे भिषक्। सन्द्रान्य वस्त्रपूतञ्च कृत्वा चुल्ल्यां निधापयेत् ॥ ७५ ॥ तीव्राग्निना पचेत्कामं नीरं च परिशोषयेत्। स्वल्पनीरांशशेषे च टङ्कणं निर्मलं हरेत् ॥ ७६ ॥ भा.टी.—एक भाग सुहागे को चूर्ण करके चौबीस भाग स्वच्छ जल में डालकर घुलने पर जल को छानकर ले लें और चूल्हे पर तीव्र अग्नि से पका- कर पानी को उड़ा लें। जब कुछ-कुछ गीला चूर्ण पात्र तल में रह जाय तो उसे उतारकर सुखा लें। इस विधि से सुहागा साफ हो जाता है ॥ ७५, ७६ ॥ वक्तव्य—उक्त प्रकार से सुहागे को स्वच्छ करने पर इसे (Boric acid) के स्थान पर प्रयुक्त किया जाता है। शोधन करने पर इसका अन्तःप्रयोग किया जाता है। अतएव यहाँ पर निर्मलीकरण और शोधन विधियाँ लिखी हैं। टङ्कणस्य शोधनम् सुचूर्णितं टङ्कणं तु खलु पञ्चपलोन्मितम्। समुज्ज्वलोदरे क्षुद्रकटाहे विन्यसेत्ततः ॥ ७७ ॥ चुल्लिकायां निधायाथ पचेद् दर्व्या प्रचालयन्। सुपुष्पितं नष्टनीरं शुद्धिमायाति टङ्कणम् ॥ ७८ ॥ टङ्कणस्य निर्मलीकरणम्—तत्त्वानि चतुर्विंशतिः, तथाच चतुर्विंशतिगुणे