रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशस्तरङ्गः ३१६ इत्यर्थः। एतच्च निर्मलीकरणं टङ्कणाम्लादिषु क्षेपार्थम्। टङ्कणस्य शोधनन्तु भक्षणार्थमेवेति विशेषः ॥ ७७-७८ ॥ भा.टी.-पाँच तोला सुहागा लेकर उसका चूर्ण करलें और एक साफ कढ़ाई में डालकर कढ़ाई को आग पर रख दें और चम्मच से चलाते जायें। जब सुहागे का जलीय भाग नष्ट हो जायगा तो खील की भाँति फूल जायगा। इसी को शुद्ध टंकण या सुहागे की खील भी कहते हैं ॥ ७७, ७८ ॥ अस्य गुणाः टङ्कणः कटुरुष्णश्च रूक्षस्तीक्ष्णश्च सारकः । कफविश्लेषणो हृद्यो वातामयनिषूदनः ॥७९॥ कासश्वासहरः कामं स्थावरादिविषापहः । अग्निदीप्तिकरश्चापि भृशमाध्माननाशनः ॥ ८० ॥ स्त्रीपुष्पजननो बल्यो विविधव्रणनाशनः ! पित्तकृच्च समाख्यातो मूढगर्भप्रवर्तकः ॥ ८१ ॥ अथास्य गुणाः-कफविश्लेषणः श्लेष्मनिःसारणः । स्पष्टप्रायमन्यत् ॥७६-८१॥ भा.टी.-सुहागा रस में कटु, गुणों में उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष तथा सारक है, कफ को निकालता है। यह हृद्य और वायुरोगों को नष्ट करता है, कास श्वास रोग में अधिक प्रयुक्त होता है। तथा स्थावर आदि विषों का नाशक है, इसके प्रयोग से आमाशय में उत्तेजना वृद्धि से अग्नि दीप्त होती है। यकृत् की क्रिया वृद्धि करने से आंतों के आध्मान को दूर करता है। यह गर्भाशय में संकोच उत्पन्न करता है जिससे आर्तव खुलकर आता है। शरीर में पाचक अंगों को पुष्टि करने से यह बल्य और अनेक प्रकार के व्रणों में इसको प्रक्षालन, मलहर आदि रूप से व्यवहार में लाया जाता है। यह शरीर में पित्त की क्रियाओं को उत्तेजित करता है और गर्भाशयमुख के विस्तृत करनेवाला होने से यह मूढ़गर्भ को बाहर निकालने में अतिसहायक है ॥ ७६-८१ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः कट्फलत्र्यूषणोपेतः सिंहीयवजसंयुतः । टङ्कणो मधुना लीढः कफविश्लेषणः परम् ॥ ८२ ॥ टङ्कणस्त्र्यूषणोपेतस्तुल्यजैपालसंयुतः । मृदुरेचनकृच्चैव सर्वोदरविनाशनः ॥ ८३ ॥ तत्त्वसङ्कथगुणे तोये द्रावितः कवलग्रहैः ।