भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 361, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 361

चतुर्दशस्तरङ्गः ३३५ प्यास तथा बेचैनी गरमी मालूम पड़ती हो तो पाँच रत्ती सोरा और पाँच रत्ती खांड को मिला जल ( अथवा अर्क गाजवान ) के साथ देने से रोगी के शरीर में पर्याप्त मात्रा में पसीना आता है और मूत्र की रुकावट दूर होकर दाह तृष्णा आदि सब शान्त होकर ज्वर जाता है। सोरा और बड़ के पत्तों को एकत्र सिल पर पीस कर, इस कल्क को वस्ति प्रदेश (पेड़ू) में लेप करने से मूत्र की रुकावट दूर हो जाती है ॥ ३८-४६ ॥ अथ सोरकद्रावकस्य नामानि कथितः सोरकद्रावः सोरकद्रावकस्तथा । सोराद्रावश्च गदितो रसशास्त्रविशारदैः ॥ ४७ ॥ भा.टी.—सोरकद्राव, सोरकद्रावक, सोराद्राव, ये नाम रसशास्त्रज्ञों ने सोरकद्राव (Nitric acid) के बताये हैं ॥ ४७ ॥ सोरकद्रावस्य निर्माणप्रकारः विशोधिते सोरके तु सोरकस्यार्द्धभागिकम् । बलिद्रावन्तु निक्षिप्य काचकूप्यां निधापयेत् ॥ ४८ ॥ सुराप्रदीपे विन्यस्य नलिकां काचनिर्मिताम् । तोयस्थकाचघटिकालग्नां तस्यां निवेशयेत् ॥ ४९ ॥ पचेन्मन्दानलेनैव ततस्तिर्यङ् निपातितम् । सञ्चितं बाष्परूपेण तोयाभं द्रावकं हरेत् ॥ ५० ॥ अतितीक्ष्णतया आभ्यन्तरप्रयोगार्थं सोरकद्रावः सजलः कार्यः । स्पष्ट- मन्यत् ॥ ४८ ॥ भा.टी.—एक स्वच्छ कांच की शीशी में शुद्ध सोरा एक भाग डालकर उसी में सोरे से आधा भाग गन्धकद्राव डाल दें । अब कांचकूपी के मुख में एक कांच की नली जोड़ कर इस नली का दूसरा मुख एक दूसरी जल में रखी हुई कांच की शीशी या कूपी के मुख से जोड़ दें । अब सोरकवाली कांचकूपी को सुराप्रदीप के ऊपर त्रिपादिका पर रखकर मन्द-मन्द अग्नि से तपायें। इस प्रकार बाष्परूप से तिरछी नली से निकलकर दूसरी शीशी में इकट्ठे हुए जल सदृश सोरकद्रावक को सावधानी से लेवें। यह स्वच्छ वर्णरहित अम्लीय द्रव्य होता है ॥ ४८-५० ॥ सजलसोरकद्रावस्य निर्माणप्रकारः षड्भागसंमितं तत्र सोरकद्रावकं हरेत् । काचपात्रे निधायाथ क्षिपेत्तत्र शनैः शनैः ॥ ५१ ॥