रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशस्तरङ्गः ३४१ भा.टी.—अर्कक्षार तीक्ष्णगुण तथा अंतःप्रयोग में गुल्म प्लीहा आदि रोग नाशक, पाचक, रस-उत्पादक, अग्निवर्द्धक तथा श्वास-कास रोग को नष्ट करता है ॥ ७५ ॥ अर्कक्षारस्य आमयिकः प्रयोगः अर्कक्षारः सलवणो नरसारसमन्वितः । अजीर्णे नाशयेदाशु जाठराग्निश्च दीपयेत् ॥७६॥ ससैन्धवं त्वर्कपत्रं त्वन्तर्धूमं दहेद्भिषक् । क्षारः समस्तुना पीतो गुल्मप्लीहोदराञ्जयेत् ॥७७॥ सत्र्यूषणो रविक्षारो मधुना परिशीलितः । विनाशयेद्विशेषेण कासं श्वासञ्च दारुणम् ॥७८॥ मित्रक्षारः सलवणो यावशूकजसंयुतः । शीलितो ह्यचिरादेव यकृद्वृद्धिहरो मतः ॥७६॥ ससैन्धवन्त्वर्कपत्रमित्यर्कलवणनाम्ना वक्ष्यते प्रयोगः ॥ ७६–७६ ॥ भा.टी.—आक के क्षार में समभाग सैन्धानमक तथा नौसादरचूर्ण मिला कर गरम जल अथवा अर्क सौंफ आदि से सेवन करने से अजीर्ण नष्ट होकर पाचक अग्नि की वृद्धि होती है । आक में पत्रों के समभाग सैन्धानमक दोनों को एकत्र मिलाकर हाँडी में बन्द करके अन्तर्धूम रूप से पुट में फूक दें । इस प्रकार प्राप्त कृष्णवर्ण के क्षार को दही के जल के साथ सेवन करने से गुल्म, प्लीहा आदि उदररोग नष्ट होते हैं । अर्कक्षार में सोंठ, मिर्च तथा पिप्पलीचूर्ण मिलाकर मधु से चटाने पर भयंकर श्वास, कास रोग में विशेष रूप से आराम आता है । अर्कक्षार, सैन्धानमक तथा जवाखार तीनों को समभाग में लेकर एकत्र उचित अनुपान, घीकुआर के रसादि से सेवन कराने पर यकृत्-वृद्धि नष्ट हो जाती है ॥ ७६–७६ ॥ अथ तिलक्षारस्य नामानि तिलक्षारः समाख्यातस्तिलभूतिस्तथैव च । होमधान्यविभूतिश्च पवित्रक्षारकस्तथा ॥८०॥ भा.टी.—तिलों के डंठल सहित पञ्चांग की राख के क्षार को तिलक्षार, तिलभूति, होमधान्यभूति, पवित्रक्षारक इन नामों से ग्रहण किया जाता है॥८०॥ तिलक्षारस्य गुणाः तिलक्षारः स्मृतस्तीक्ष्णो मूत्ररोधनिबर्हणः । अश्मरीनाशनश्चैव प्लीहघ्नो व्रणदारणः ॥८१॥