भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३४२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—तिलक्षार तीक्ष्ण होता है और मूत्र की रुकावट या कमी को दूर करता है । अश्मरी को गलाने में यह अच्छा कार्य करता है । प्लीहावृद्धि को हटाता है और व्रणशोथ को फोड़ने का काम करता है ॥ ८१ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सत्र्यूषणस्तिलक्षारः सैन्धवेन समन्वितः । शीलितो ह्यचिरादेव जाठराग्निप्रदीपनः ॥८२॥ अङ्कोलक्षारसंयुक्तस्तिलक्षारस्तु शीलितः । मधुनाऽन्ते तोयपानान्मूत्ररोधं विनाशयेत् ॥८३॥ तिलक्षारः सयवजः शीलितो निम्बुकाम्बुना । वृक्कशूलं निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥८४॥ तिलक्षारः सयवजः कदलीक्षारमिश्रितः । शीलितो मधुना काममश्मरीमाशु नाशयेत् ॥८५॥ तिलभूतिर्माषमिता रुचकेन समन्विता । तक्रेण मधुना वापि शीलित। त्वश्मरीं जयेत् ॥८६॥ होमधान्यविभूतिस्तु धात्रीक्षारसमन्विता । गोक्षुरक्वाथसंयुक्ता नाशयेन्मूत्रशर्कराम् ॥८७॥ पवित्रक्षारचूर्णन्तु यवजेन प्रलेपितम् । व्रणशोथे करोत्याशु दारणं परमोत्तमम् ॥८८॥ होमधान्यविभूतिस्तु शीलिता माषकोन्मिता । मासाशनभवाजीर्णनाशिनी परिकीर्तिता ॥८६॥ शरपुङ्खक्षारयुतस्तिलक्षारस्तु शीलितः । माषकप्रमितं तूर्णं गुल्ममुन्मूलयेद्भृशम् ॥६०॥ तिलक्षारः अश्मरीनाशनो विशेषात् । अङ्कोलक्षारेण तदाख्यवृक्षभस्मना, होमधान्यविभूतिः तिलक्षारः । पवित्रक्षारोऽपि तिलक्षार एव ॥ ८२–६० ॥ भा.टी.—साँठ, मिर्च, पिप्पली तथा सैन्धानमकचूर्ण के साथ तिलक्षार मिलाकर सेवन करने से जठराग्नि तेज हो जाती है । मूत्ररोध (मूत्र की रुकावट) में तिलक्षार को अंकोल ( ढेरा ) क्षार में मिलाकर मधु से चटायें और थोड़ी देर में शीतलजल पिलायें तो मूत्ररोध हट जाता है । अर्थात् मूत्र खुलकर आने लगता है । तिलक्षार और जवाखार दोनों को समभाग में लेकर निम्बूस्वरस से

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