भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३४८ रसतरङ्गिणी जाती है अथवा स्पर्श में स्निग्ध (चिकना) है। यह शीघ्र ही पच जाता है अथवा इसके प्रयोग से स्थानिक कफप्रकोपजन्य गौरव दूर हो जाता है अतः यह लघुगुण कहा जाता है। इसके प्रयोग में स्राव उत्पन्न होने के कारण मलबन्ध (कब्ज) नहीं होने पाता है। सैन्धानमक वीर्य में मृदु तथा पित्तहर माना जाता है ॥ ११६, १२० ॥ सैन्धवस्य उत्पत्तिस्थानम् पञ्चाम्बुवर्तिनः सिन्धोः पूर्वभागे विशेषतः । शिलोच्चयखनौ सिन्धूपलं समुपलभ्यते ॥ १२१ ॥ पञ्चाम्बुः पञ्चाबदेशः । शिलोच्चयखनौ इति स्वभावतः खनिजोऽयं लवणो न कृत्रिम इति भावः ॥ १२१ ॥ भा.टी.—पञ्जाब प्रान्त की सिन्धुनदी के पूर्वी भाग में विशेष रूप से पर्वतीय खानों से सैन्धानमक प्राप्त किया जाता है ॥ १२१ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सैन्धवं खलु धत्तूरशिफया परिपेषितम् । उष्णीकृत्य प्रलिप्तं तु व्रणशोथहरं परम् ॥ १२२ ॥ धत्तूरशिफा धत्तूरमूलम् ॥ १२२ ॥ भा.टी.—व्रणशोथ को बैठाने के लिये सैन्धानमक को धत्तूरे की मूल के साथ पीसकर गरम करके शोथ पर लेप किया जाता है जिससे शोथ और वेदना दोनों ही शान्त हो जाते हैं ॥ १२२ ॥ नारिकेललवणः सुविपक्वं ससलिलं नारिकेलं समाहरेत् । अपनीय जटां वृद्धिपत्रेण स्फोटयेद् दृशम् ॥ १२३ ॥ जातरन्ध्रान्नारिकेलात्नीरं सर्वं परित्यजेत् । सुचूर्णितं सैन्धवन्तु दशतोलकसंमितम् ॥ १२४ ॥ निक्षिप्य रन्ध्रमार्गेण ततो रन्ध्रं निरोधयेत् । वसनेन समाच्छाद्य परितो लेपयेन्मृदा ॥ १२५ ॥ रौद्रयन्त्रे विशोष्याथ पुटयेत्तु महापुटे । तद्गोलकं स्वाङ्गशीतं प्रयत्नेन समाहरेत् ॥ १२६ ॥ सैन्धवं कज्जलीवर्णं कपालांशोज्झितं हरेत् । लवणो नारिकेलाख्यः समाख्यातो भिषग्वरैः १२७ ॥

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