भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 373

चतुर्दशस्तरङ्गः ३४७ आता है। इसी तरह इस योग से शूल, अग्निमान्द्य, अजीर्ण तथा गुल्मरोग में भी आराम आता है। इमली के क्षार में पाँचों नमक, जीरा सफेद, सोंठ, मिर्च, पीपलचूर्ण मिलाकर ग्रहणीहर द्रव्यों के कषाय आदि के अनुपान से सेवन करने पर ग्रहणीरोग, अरुचि, भयंकर उदरशूल, उदराध्मान, परिणामशूल, विष्टब्धाजीर्ण रोगों में बहुत लाभ होता है। अन्न में अरुचि को दूर करने के लिये इमलीक्षार को मुनक्का और खाँड़ की चटनी मिलाकर चटाया जाता है। इमलीक्षार को सोंठ, मिर्च, पिप्पलीचूर्ण में मिलाकर सेवन करने से शीघ्र ही अग्निमान्द्य और भयंकर वाताजीर्ण रोग में लाभ होता है। छोटे-छोटे बालकों के अतीसार तथा ग्रहणी में इमलीक्षार में काली मिर्च और शंखभस्म मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र ही लाभ होता है ॥ ११०-११६ ॥ अथ सैन्धवस्य नामानि सैन्धवः सिन्धुलवणं सिन्धूत्थं सिन्धुदेशजम् । सिन्धूपलं सिन्धुभवं सैन्धवं सिन्धुमन्थजम् ॥ ११७ ॥ शोतशीवं शीतशिवं नादेयञ्च शिलीत्मकम् । शिवं सितशिवञ्चैव वशिरञ्च निगद्यते ॥ ११८ ॥ भा.टी.-सैन्धव, सिन्धुलवण, सिन्धूत्थ, सिन्धुदेशज, सिन्धूपल, सिन्धुभव, सैन्धव,सिन्धुमन्थज, शीतशीव, शीतशिव, नादेय, शिलात्मक, शिव, सितशिव और वशिर; ये सब नाम सैन्धानमक के कहे जाते हैं ॥ ११७, ११८ ॥ अस्य गुणाः सैन्धवं लवणं हृद्यं वृष्यं नेत्र्यं रुचिप्रदम् । पाचनं दीपनञ्चैव त्रिदोषशमनं परम् ॥ ११९ ॥ व्रणदोषहरं शीतं स्निग्धं लघु विबन्धजित् । मृदुवीर्यं पित्तहरं विबुधैः परिकीर्तितम् ॥ १२० ॥ भा.टी.-- सैन्धानमक अन्य लवणों की अपेक्षा स्वादिष्ट होता है अथवा हृदय के लिए लाभदायक है। इसके प्रयोग से शरीर में धातुओं की पुष्टि होती है। यह नेत्रों के लिये तथा नेत्ररोगों में लाभदायक हैं। सैन्धानमक के प्रयोग से पाचकरस (आमाशयिक रस) उत्पन्न होते हैं और क्षुधावृद्धि होती है। यह सामान्यतः त्रिदोषप्रकोपशामक है, व्रणों में होनेवाली विकृतियों को दूर करता है। उपयोग करने पर यह वीर्य में शीतगुण उत्पादक है। इसके प्रयोग से श्लेष्मिक रस की उत्पत्ति होने से पाचक अंगों तथा सन्धियों की खरता दूर हो