रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
चतुर्दशस्तरङ्गः ३४७ आता है। इसी तरह इस योग से शूल, अग्निमान्द्य, अजीर्ण तथा गुल्मरोग में भी आराम आता है। इमली के क्षार में पाँचों नमक, जीरा सफेद, सोंठ, मिर्च, पीपलचूर्ण मिलाकर ग्रहणीहर द्रव्यों के कषाय आदि के अनुपान से सेवन करने पर ग्रहणीरोग, अरुचि, भयंकर उदरशूल, उदराध्मान, परिणामशूल, विष्टब्धाजीर्ण रोगों में बहुत लाभ होता है। अन्न में अरुचि को दूर करने के लिये इमलीक्षार को मुनक्का और खाँड़ की चटनी मिलाकर चटाया जाता है। इमलीक्षार को सोंठ, मिर्च, पिप्पलीचूर्ण में मिलाकर सेवन करने से शीघ्र ही अग्निमान्द्य और भयंकर वाताजीर्ण रोग में लाभ होता है। छोटे-छोटे बालकों के अतीसार तथा ग्रहणी में इमलीक्षार में काली मिर्च और शंखभस्म मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र ही लाभ होता है ॥ ११०-११६ ॥ अथ सैन्धवस्य नामानि सैन्धवः सिन्धुलवणं सिन्धूत्थं सिन्धुदेशजम् । सिन्धूपलं सिन्धुभवं सैन्धवं सिन्धुमन्थजम् ॥ ११७ ॥ शोतशीवं शीतशिवं नादेयञ्च शिलीत्मकम् । शिवं सितशिवञ्चैव वशिरञ्च निगद्यते ॥ ११८ ॥ भा.टी.-सैन्धव, सिन्धुलवण, सिन्धूत्थ, सिन्धुदेशज, सिन्धूपल, सिन्धुभव, सैन्धव,सिन्धुमन्थज, शीतशीव, शीतशिव, नादेय, शिलात्मक, शिव, सितशिव और वशिर; ये सब नाम सैन्धानमक के कहे जाते हैं ॥ ११७, ११८ ॥ अस्य गुणाः सैन्धवं लवणं हृद्यं वृष्यं नेत्र्यं रुचिप्रदम् । पाचनं दीपनञ्चैव त्रिदोषशमनं परम् ॥ ११९ ॥ व्रणदोषहरं शीतं स्निग्धं लघु विबन्धजित् । मृदुवीर्यं पित्तहरं विबुधैः परिकीर्तितम् ॥ १२० ॥ भा.टी.-- सैन्धानमक अन्य लवणों की अपेक्षा स्वादिष्ट होता है अथवा हृदय के लिए लाभदायक है। इसके प्रयोग से शरीर में धातुओं की पुष्टि होती है। यह नेत्रों के लिये तथा नेत्ररोगों में लाभदायक हैं। सैन्धानमक के प्रयोग से पाचकरस (आमाशयिक रस) उत्पन्न होते हैं और क्षुधावृद्धि होती है। यह सामान्यतः त्रिदोषप्रकोपशामक है, व्रणों में होनेवाली विकृतियों को दूर करता है। उपयोग करने पर यह वीर्य में शीतगुण उत्पादक है। इसके प्रयोग से श्लेष्मिक रस की उत्पत्ति होने से पाचक अंगों तथा सन्धियों की खरता दूर हो
३४८ रसतरङ्गिणी जाती है अथवा स्पर्श में स्निग्ध (चिकना) है। यह शीघ्र ही पच जाता है अथवा इसके प्रयोग से स्थानिक कफप्रकोपजन्य गौरव दूर हो जाता है अतः यह लघुगुण कहा जाता है। इसके प्रयोग में स्राव उत्पन्न होने के कारण मलबन्ध (कब्ज) नहीं होने पाता है। सैन्धानमक वीर्य में मृदु तथा पित्तहर माना जाता है ॥ ११६, १२० ॥ सैन्धवस्य उत्पत्तिस्थानम् पञ्चाम्बुवर्तिनः सिन्धोः पूर्वभागे विशेषतः । शिलोच्चयखनौ सिन्धूपलं समुपलभ्यते ॥ १२१ ॥ पञ्चाम्बुः पञ्चाबदेशः । शिलोच्चयखनौ इति स्वभावतः खनिजोऽयं लवणो न कृत्रिम इति भावः ॥ १२१ ॥ भा.टी.—पञ्जाब प्रान्त की सिन्धुनदी के पूर्वी भाग में विशेष रूप से पर्वतीय खानों से सैन्धानमक प्राप्त किया जाता है ॥ १२१ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सैन्धवं खलु धत्तूरशिफया परिपेषितम् । उष्णीकृत्य प्रलिप्तं तु व्रणशोथहरं परम् ॥ १२२ ॥ धत्तूरशिफा धत्तूरमूलम् ॥ १२२ ॥ भा.टी.—व्रणशोथ को बैठाने के लिये सैन्धानमक को धत्तूरे की मूल के साथ पीसकर गरम करके शोथ पर लेप किया जाता है जिससे शोथ और वेदना दोनों ही शान्त हो जाते हैं ॥ १२२ ॥ नारिकेललवणः सुविपक्वं ससलिलं नारिकेलं समाहरेत् । अपनीय जटां वृद्धिपत्रेण स्फोटयेद् दृशम् ॥ १२३ ॥ जातरन्ध्रान्नारिकेलात्नीरं सर्वं परित्यजेत् । सुचूर्णितं सैन्धवन्तु दशतोलकसंमितम् ॥ १२४ ॥ निक्षिप्य रन्ध्रमार्गेण ततो रन्ध्रं निरोधयेत् । वसनेन समाच्छाद्य परितो लेपयेन्मृदा ॥ १२५ ॥ रौद्रयन्त्रे विशोष्याथ पुटयेत्तु महापुटे । तद्गोलकं स्वाङ्गशीतं प्रयत्नेन समाहरेत् ॥ १२६ ॥ सैन्धवं कज्जलीवर्णं कपालांशोज्झितं हरेत् । लवणो नारिकेलाख्यः समाख्यातो भिषग्वरैः १२७ ॥
चतुर्दशस्तरङ्गः २४६ नारिकेललवणनिर्माणप्रकारः—ससलिलमिति शुष्कफलपरिहाराय । जटां उपरितनशुष्कप्रायतृणौघद्वयम् । रौद्रयन्त्रे आतपे इत्यर्थः कपालं नारिकेलमजोपरि कठिनकाष्ठरूपमावरणम् ॥ १२३-१२७ ॥ भा.टी.—एक सुपरिपक्व जलयुक्त नारियल को लेकर उसकी बाहरी जटाओं को चाकू से साफ करलें । अब इस कच्चे दूधिया गोले को जहाँ पर आंख सी बनी हुई होती है उस स्थान पर छेद करके भीतर का सारा जल निकाल दें और उसी छेद से गोले के भीतर दस तोला सैन्धानमक का सूक्ष्मचूर्ण भरदें और छेद को बन्द करके गोले के चारों तरफ अच्छी तरह कपड़मिट्टी कर धूप में सुखा लें । अच्छी तरह सूखने पर इस गोले को महापुट में रख कर फूँक दें । पुट के शान्त होने पर स्वांगशीत उक्त गोले को सावधानी से बाहर निकाल लें । इसमें से नारियल के बाहरी कठिन भाग की काली और कठिन भस्म को छोड़ कर भीतरी काले वर्ण के लवण को लेलें । इसी को नारिकेललवण कहा जाता है ॥ १२३-१२७ ॥ अस्य गुणाः लवणो नारिकेली यः पाचनः पित्तनाशनः, अम्लपित्तहरः कामं पित्तशोषजशूलनुत् ॥ १२८ ॥ वातजं पित्तजं शूलं श्लेष्मजं सन्निपातजम् । शूलञ्च परिणामोत्थं नाशयेद्विकल्पतः ॥ १२६॥ मारुतकोपात् पित्ताशये पित्तशोषस्तस्माज्जातं शूलमपनयतीति विशेषः । पित्तशोषलक्षणं यथा—"पित्ताशयगतं पित्तं शुष्कं मारुतकोषतः । कुर्यात् शूलादिकं घोरं पित्तशोपं तदुच्यते” ॥ १२८, १२६ ॥ भा.टी.—नारिकेललवण पाचक और पित्तशामक होता है । यह अम्ल- पित्त को दूर करने तथा पित्तशोषजन्य शूल को शान्त करने के लिये सर्वोत्तम औषधि है । इसके अतिरिक्त नारिकेललवण वातिक, पैत्तिक, श्लेष्मिक तथा सन्निपातिक शूल और परिणामशूल को भी निःसंदेह नष्ट करता है ॥१२८, १२६॥ वक्तव्य—वायुप्रकोप से जब पित्ताशय में शोप हो जाता है अर्थात् पित्ता- शय में पहिले शोथ होकर उसका मुख बन्द हो जाने से पित्त प्रणाली में पित्त जमकर पथरी का रूप धारण कर लेता है तो इसके कारण पित्ताशय में तीव्र शूल होने लगती है । इसी को "पित्ताशयगतं पित्तं शुष्कं मारुतकोषतः । कुर्यात् शूलादिकं घोरं पित्तशोथं तदुच्यते ॥” लिखा है ।
३५० रसतरङ्गिणी अस्य आमयिकः प्रयोगः लवणो नारिकेलाख्यो माषकद्वयसंमितः । नृसारयवजोपेतः पित्तशोषजशूलनुत् ॥ १३० ॥ भा.टी.—दो मासे नारिकेललवण को समभाग नौसादर और जवाखार चूर्ण में मिला जल अनुपान से देने पर पित्तशोषजन्य शूल में आराम आता है ॥ १३० ॥ अर्कलवणम् सुचूर्णितं सैन्धवन्तु समार्कदलसंयुतम् । अन्तर्धूमं पचेद्धीमान् स्वाङ्गशीतमथोद्धरेत् ॥ १३१ ॥ जायते खल्वसम्पिष्टं लवणं कज्जलप्रभम् । आयुर्वेदाचार्यवयैर्नाम्नार्क लवणं मतम् ॥१३२॥ अर्कलवणम्—समार्कदलसंयुतं तुलायां लवणसमानार्कपत्रसंयुक्तम् ॥१३१,१३२॥ भा.टी.—सैन्धानमक को अच्छी तरह पीसकर चूर्ण कर लें, फिर उसमें समभाग आक के पत्ते मिलाकर एक हांड़ी में भर कर उसका मुख किसी सकोरे से अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूंक दें जिससे वह सम्पुट अन्तर्धूम अच्छी तरह पक जाय । स्वांगशीत होने पर सम्पुट को निकाल उसमें कुछ काले से वर्ण के लवण को निकाल खरल से पीसकर रख लें । इस विधि से बनाये हुए लवण को आयुर्वेद के आचार्य लोग अर्कलवण के नाम से व्यवहार में लाते हैं ॥ १३१, १३२ ॥ अस्य गुणाः यकृत्प्लीहोदरहरं रुचिरं मलभेदनम् । विशेषतः समाख्यातं तन्त्रेऽर्कलवणं बुधैः ॥१३३॥ भा.टी.—अर्कलवण के प्रयोग से यकृत् तथा प्लीहोदर रोग दूर होता है। अन्न में रुचि पैदा होती है। कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से मल पतला होकर आता है और कब्ज नहीं रहता है ॥ १३३ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः माषकार्द्धमितं त्वर्कलवणं कोष्णवारिणा । पथ्याशिभिस्तु पुरुषैः सततं परिशीलितम् ॥ १३४ ॥ वातिकं श्लैष्मिकं वापि सज्ज्वरं वापि विज्वरम् । सकोष्ठबद्धं व्यथया चीत्कारयुतयापि वा ॥ १३५ ॥
चतुर्दशस्तरङ्गः ३५१ संयुक्तं कठिनस्पर्शं ह्यतीसारादिवर्जितम् । यकृद्दाल्युदरं नूतनं प्लीहोदरमलं हरेत् ॥१३६॥ यकृत् प्लीहाहरं विशेषतः । कोष्णवारिणा प्रयोगः चीत्कारयुतया व्यथया इति असह्यतीव्रपीडयेति यावत् । प्लीहोदरं अलम् इति च्छेदः । अलमत्य- र्थम् ॥ १३४-१३६ ॥ भा.टी.-आधे मासे अर्कलवण को गुनगुने जल से प्रतिदिन सेवन करते हुये यदि मनुष्य (रोगी) अच्छी तरह पथ्य भोजनादि को ग्रहण करता रहे तो इसके प्रयोग से वातिक या श्लैष्मिक यकृत् (लीवर) की खराबी और नवीन प्लीहोदर में जिनमें ज्वर हो या न हो, मलबन्ध हो, यकृत् में पीड़ा के कारण रोगी चिल्लाता पुकार करता हो और स्पर्श में यकृत् अतिकठिन हो और अतिसार आदि लक्षण न हो तो ऐसी अवस्था में उक्त अर्कलवण अवश्य लाभ करता है॥१३४-१३६॥ अथ सामुद्रलवणस्य नामानि सामुद्रं लवणं ख्यातं समुद्रजलसम्भवम् । समुद्रजं सागरजं मतं सामुद्रकञ्च तत् ॥१३७॥ भा.टी.-समुद्रलवण को समुद्रजलसम्भव, समुद्रज, सागरज, सामुद्रक, नाम से व्यवहार किया जाता है ॥ १३७ ॥ अस्य गुणाः समुद्रलवणं हृद्यं रुच्यं स्निग्धञ्च दीपनम् । साक्षारं भेदि वातघ्नं नात्युष्णं नातिशीतलम् ॥ १३८ ॥ भा.टी.-समुद्रलवण हृदय के लिये लाभकारी, अन्न में रुचि उत्पन्न करनेवाला, स्निग्ध, अग्निदीपक, क्षारीय स्वाद युक्त, पतला दस्त लानेवाला, वातशामक और न गरम नाति शीतल अर्थात् समशीतोष्ण प्रकृति का होता है ॥ १३ ॥ समुद्रलवणस्य परिचयः समुद्रजलसंशोषाल्लवणं जायते तु यत् । सामुद्रं लवणं तत्तु समाख्यातं भिषग्वरैः ॥ १३६ ॥ अथ समुद्रलवणपरिचय—ख्यातं प्रसिद्धम् । समुद्रजलसंशोषादिति तस्यो- त्पत्तिपरिचयः ॥ १३६ ॥ भा.टी.—क्योंकि इस समुद्रनमक को समुद्रीयजल को एक लोहपात्र में भरकर अग्नि पर चढ़ा कर जलीयांश को सुखाकर तैयार किया जाता है, अतः वैद्य लोग इसको समुद्रलवण कहते हैं ॥ १३६ ॥
३५२ रसतरङ्गिणी अथ विडलवणस्य नामानि विडं कृत्रिमकञ्चैव सुपाक्यं द्राविडन्तथा । आसुरञ्च विटञ्चाथ धूर्त्तञ्च कृतकं मतम् ॥१४०॥ अथ विडलवणपरिचयः—कृत्रिमकं न स्वाभाविकमपि तु योगविशेषजात- मित्यर्थः ॥ १४० ॥ भा.टी.—विडलवण को विड, कृत्रिमक ( बनावटी ), सुपाक्य, द्राविड, आसुर, विट, धूर्त्त तथा कृतक नाम से व्यवहार किया जाता है ॥ १४० ॥ वक्तव्य—विडलवण सैन्धानमक की भाँति स्वाभाविक रूप से कहीं खान आदि से प्राप्त नहीं होता है, किन्तु इसे बनाया जाता है, अतः इसको कृतक- लवण या कृत्रिमकलवण कहा जाता है । अस्य गुणाः विडं रुच्यञ्च तीक्ष्णोष्णं सूक्ष्मं लघु च दीपनम् । सक्षारं हृद्यमूर्ध्वाधः कफवातानुलोमनम् ॥१४१॥ अजीर्णानाहविष्टम्भहरं शूलविबन्धजित् । हृद्गौरवप्रशमनं वातघ्नञ्च प्रकीर्त्तितम् ॥१४२॥ कफवातयोरुपर्य्यधो यथामार्गप्रवर्त्तनात् अनुलोमकम् । वातघ्नञ्च प्रकीर्त्तितं पूर्वतनैरिति शेषः ॥ १४०–१४२ ॥ भा.टी.—विडलवण खाने में अच्छा लगता है और अन्न में रुचि उत्पन्न करता है । तीक्ष्ण तथा उष्ण गुण युक्त, सूक्ष्म (क्षार के समान सूक्ष्म भाग व स्थानों मे सरलता से प्रवेश करनेवाला ), लघु ( शीघ्र पच जानेवाला या हल्कापन करनेवाला ) अग्निदीपक और क्षारीय रसयुक्त होता है । इसके अन्तः- प्रयोग से ऊपर की तरफ कफ प्रवृत्ति ( निकला ) और नीचे गुदा की तरफ अपानवायु की प्रवृत्ति होती है । अजीर्ण, आध्मान, विष्टब्धाजीर्ण मिट जाते हैं । इसके प्रयोग से साधारण उदरशूल, मलबन्ध, अजीर्णजन्य हृदय रोग और वायु का शमन होता है ॥ २४१, १४२ ॥ बिडलवणस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः वस्वृत्तिसेरकमितं लवणं रोमकाभिधम् । पञ्चाशत्तोलकमितं चूर्णमामलकोद्भवम् ॥ १३ ॥ समादाय भिषग्वर्य्यस्ततः सम्मेलयेद् भृशम् । ततः खल्वस्य चूर्णस्य चतुर्थांशं विधानवित् ॥ १४४ ॥
२३ चतुर्दशस्तरङ्गः ३५३ मृल्लिप्तायां क्षुद्रकण्ठ्यां हण्डिकायां तु विन्यसेत् । चुल्लिकायां निधायाथ विधानज्ञो भिषग्वरः ॥१४५॥ प्रज्वाल्य तीव्रज्वलनं पच्चेद्वोराद्वयं भिषक् । हण्डिकाया मध्यभागो यावदायाति रक्तताम् ॥१४६॥ क्षिपेत्ततः क्रमेणैव शेषं चूर्णं भिषग्वरः । प्रखरेणानलेनाथ यामद्वितयमात्रकम् ॥१४७॥ विपचेदविरतं रसतन्त्रविधानवित् । स्वतः शीते च लवणं बिडाख्यन्तु समाहरेत् ॥१४८॥ चतुर्विंशतिसङ्ख्याकसेरकप्रमितं शुभम् । ततः सर्वेषु योगेषु योजयेद्भिषजां वरः ॥१४९॥ निर्माणप्रकारः कृत्रिमत्वादस्य निर्दिष्टः-रोमकलवणं २८ सेरकम्, आम- लकचूर्णम् ५० तोलकम्, यथानिर्देशं पाकः, पूर्वे चतुर्थांशमात्रपाकः । अत्र च लवणजलांशशोषात् आमलकीचूर्णभस्मीभावाच्च २४ सेरकमितं लवणमात्रमव- शिष्यते इति विशेषः । स्पष्टमन्यत् ॥१४३-१४६॥ भा.टी.-अट्ठाईस सेर सांभरनमक को अच्छी तरह पीस कर इसमें पचास तोले सूखे हुए आँवलों का चूर्ण मिलाकर रखलें । अब इस चूर्ण में से चतु- र्थांश चूर्ण लेकर एक अच्छी तरह कपड़मिट्टी की हुई मिट्टी की संकुचित मुख- वाली हाँड़ी में डालकर इस हाँड़ी को चूल्हे पर चढ़ाकर दो घण्टे तक बहुत तेज अग्नि से पकायें । जब अग्नितप से हाँड़ी का मध्यभाग खूब लाल दीखने लगे तो उस हाँड़ी में फिर धीरे-धीरे सब अवशिष्ट चूर्ण को डालकर छः घण्टे तक तेज अग्नि से लगातार पकायें, जब अग्नि देना बन्द करने पर हाँड़ी स्वांगशीत हो जाय तो उसे नीचे उतार उसमें से बिडलवण को निकाल लें । उक्त विधान से बनाया हुआ बिडलवण द्रव्य परिमाण के अनुसार पूरी तौल में न होकर चौबीस सेर तौल में प्राप्त होता है । इस प्रकार बनाये हुए बिड- लवण को लिखित योगों में प्रयुक्त करना चाहिये ॥१४३-१४६॥ वक्तव्य -अट्ठाईस सेर और पचास तोले के स्थान पर केवल चौबीस सेर नमक तय्यार होने का कारण यह है कि तीव्र अग्नि से पकाने से साँभरनमक तथा आमलकी चूर्ण में होनेवाला जलीयांश (चार से पचास तोला) सूख जाता है और आमलकी चूर्ण की भस्म हो जाती है ।
३५४ रस्तरङ्गिणी बिडलवणस्य द्वितीयो निर्माणप्रकारः अशीतितोलकमितं लवणं रोमकाभिधम् । चूर्णमामलकोद्भूतं दशतोलकसंमितम् ॥१५०॥ मृल्लिप्तदृढहण्डिकायां तु विन्यस्य प्रखराग्निना । यामद्वयं विपाच्याथ स्वाङ्गशीतमथोद्धरेत् ॥१५१॥ विडाभिधं तु लवणं रसतन्त्रविधानवित् । अनुभूतोऽति सुगमः प्रकारोऽयं प्रकाशितः ॥१५२॥ भा. टी.—अस्सी तोला रोमकलवण (साँभर नमक) और दस तोला सूखे हुए आँवलों का चूर्ण लेकर दोनों को एकत्र पीस लें और एक कपड़मिट्टी की हुई मजबूत मिट्टी की संकुचित गलेवाली हाँडी में डालकर चूल्हे में छः घंटे की तीव्र अग्नि से पकायें, छः घंटे के बाद हाँडी के स्वांगशीत होने पर उसमें से बिडलवण को निकाल लें। बिडलवण बनाने का यह अतिसरल अनुभूत क्रम है ॥१५०–१५२॥ अथ सौवर्चललवणस्य नामानि सौवर्चलं च रुचकं रुच्यकं हृद्यगन्धकम् । अक्षघ्नं कृष्णलवणं वै काललवणं स्मृतम् ॥१५३॥ सौवर्चल, रुचक, रुच्यक, हृद्यगन्धक, अक्ष, कृष्णलवण तथा काललवणः ये सब नाम काले नमक के कहे जाते हैं ॥१५३॥ अस्य गुणाः सौवर्चलं मतं हृद्यं पाचनं दीपनं परम् । रोचनं भेदनञ्चापि विशदं वातनाशनम् ॥१५४॥ सस्नेहं लघु गुल्मघ्नं तूर्ध्ववातानुलोमनम् । विबन्धानाहशूलघ्नं जन्त्वरोचकनाशनम् ॥१५५॥ सौवर्चलम्—विशदं पैच्छिल्यरहितम् ॥१५४–१५५॥ भा.टी.—सौवर्चलनमक हृद्य, उत्तम, दीपन, पाचन और खाने में अच्छा लगनेवाला होता है। यह भेदन (कब्ज दूर करनेवाला) विशदगुण और वातशामक होता है। यह किञ्चित् स्निग्ध, लघुपाकी, गुल्महर और ऊर्ध्ववातानु- लोमक अर्थात् शुद्ध डकार लानेवाला है। इसके प्रयोग से मलबन्ध, आनाह (अफारा) तथा उदरशूल नष्ट होते हैं। यह उदरकृमि तथा अरुचि को नष्ट करता है ॥१५४–१५५॥
चतुर्दशस्तरङ्गः ३५५ सौवर्चललवणस्य निर्माणप्रकारः विशुद्धं स्वर्जिकाक्षारं चतुष्पलमितं हरेत् । द्रावयेदथ यत्नेन तोयेऽष्टपलसंमिते ॥ १५६ ॥ यातीह द्रवतां यावत् तावत्तु सैन्धवं ततः । सर्जिकाया द्रवे यत्नान्निचिपेद्भिषजां वरः ॥ १५७ ॥ ततः सुविमले पात्रे न्यस्य चुल्ल्यां निधापयेत् । पचेत्तीव्राग्निना कामं तोयञ्च परिशोषयेत् ॥ १५८ ॥ निःशेषं सलिलं ज्ञात्वा किञ्चित्कालं पुनः पचेत् । पाकशेषे च लवणं रुचकाख्यं समाहरेत् ॥ १५६ ॥ सौवर्चलस्यापि कृत्रिमत्वान्निर्माणप्रकारनिर्देशः—यावत्परिमाणं द्रवतां याति तावत्, यत्नादिति किञ्चित् किञ्चित् लवणस्य क्रमशः प्रक्षेपादिति भावः । किञ्चित्कालं पुनः पचेदित्यत्र तीव्राग्निना इति शेषः ॥ १५६-१५६ ॥ भा.टी.—चार पल शुद्ध साफ किया हुआ सज्जीखार लेकर उसको आठ पल जल में अच्छी तरह घोल लें । अब इस सज्जीखारद्रव में धीरे-धीरे इतना सैन्धानमक का चूर्ण डालें जितना कि उस द्रव में घुल जाय । अब इस मिश्रित द्रव्य को एक स्वच्छ मिट्टी के पात्र में डालकर तीव्र अग्नि से पकायें और जलीय- भाग को उड़ा दें । जब इसमें से सम्पूर्ण जल सूख जाय तो फिर भी थोड़ी देर और चूल्हे पर पकायें । अच्छी तरह पक जाने पर पात्र को नीचे उतारकर काले नमक को निकाल लें ॥ १५६-१५६ ॥ अथ रोमकलवणस्य नामानि रोमकं रोमलवणं रौमञ्च रौमकं मतम् । शाकम्भरीयञ्च गडं साम्भरं सम्भरोद्भवम् ॥ १६० ॥ रोमक, रोमलवण, रौम, रौमक, शाकम्भरीय, गड, साम्भर तथा सम्भरोद्भव; ये सब नाम सांभरनमक के कहे जाते हैं ॥ १६० ॥ रोमकस्य उत्पत्तिस्थानं निर्वचनञ्च यस्माज्जज्ञे विशेषेण रोमान्त्यन्तिके पुरा । तस्माद्भिषग्वरैरेतद्रोमकं परिकीर्तितम् ॥ १६१ ॥ शाकम्भरह्रदोद्भूतजलाद्यस्मात्प्रजायते । तस्मादेतद्भिषग्वर्यैर्मतं शाकम्भरीयकम् ॥ १६२ ॥
३५६ रसतरङ्गिणी रोमकम्—रोमानदीसमीपे जायमानत्वात् । शाकम्भरह्रदोऽजमेरनिकटवर्ती सांभरनाम्ना प्रसिद्धः ॥ १६१, १६२ ॥ भा.टी.—रोमक नमक पहिले पहल रोम नदी के किनारे पाया गया था, अतः वैद्य लोगों ने इसको रोमक नाम से व्यवहार करना आरम्भ कर दिया । और आजकल यह शाकम्भर (सांभर) ह्रद (बड़े तालाब) के जल से बनाया जाता है, अतः वैद्य लोग इसको शाकम्भरीय (सांभर) नाम से कहने लगे हैं ॥ १६१, १६२ ॥ वक्तव्य—आजकल यह लवण जोधपुर स्टेट में अजमेर के पास सांभर झील (लेक) में बनाया जाता है । अर्थात् वहाँ के स्वाभाविक नमकीन जल- वाले तालाब को काटकर बाहर बनी हुई क्यारियों में डालकर बनाया जाता है । इस तरह वहाँ से लाखों मन प्रतिवर्ष यह नमक बाहर भेजा जाता है । अस्य गुणाः साम्भरं लवणं ख्यातं भेदनं दीपनं परम् । अत्युष्णं लघु तीक्ष्णञ्च कटुपाकि च पित्तलम् ॥ १६३ ॥ मलदोषहरं सूक्ष्ममर्शोघ्नं वातनाशनम् । कफप्रणाशनञ्चैव विशदं कोष्ठशोधनम् । १६४ ॥ भा.टी.—सांभरनमक भेदन और अत्यन्त दीपक है । यह गुणों में अति उष्ण, लघु और तीक्ष्ण होने से पित्तवर्धक, और विपाक में कटु माना जाता है। इसके प्रयोग से मलदोष (अत्यन्त दुर्गन्धि, आमगन्धि, पिच्छिलता आदि) दूर होते हैं और सूक्ष्म स्रोतोऽनुगामी, अर्श तथा वातनाशक, कफनाशक, पिच्छि- लतारहित और कोष्ठशोधक है ॥ १६३, १६४ ॥ अथ लवणद्रावस्य नामानि लवणद्रावकः ख्यातो लवणाम्लसमाह्वयः । पटुद्रावश्च कथितः पटुकद्रावकस्तथा ॥ १६५ ॥ भा.टी.—लवणद्रावक, लवणाम्ल, पटुद्राव तथा पटुकद्रावक; ये सब नाम लवण द्राव अर्थात् Hydrochloric acid के कहे जाते हैं ॥ १६५ ॥ लवणद्रावस्य निर्माणप्रकारः सुचूर्णितं सैन्धवन्तु भाजने भर्जयेद्भिषक् । जलीयांशे विनिष्क्रान्ते चुल्लीतस्त्ववतारयेत् ॥ १६६ ॥ षडभागसंमितञ्चाथ भृष्टचूर्णितसैन्धवम् । काचकुप्यां निधायाथ विधानज्ञो भिषग्वरः ॥ १६७ ॥
चतुर्दशस्तरङ्गः ३५७ रुद्रभागमितञ्चात्र गन्धकद्रावकं शुभम् । शनैः शनैस्तु निक्षिप्य चुल्लिकायां निधापयेत् ॥ १६८ ॥ ततोऽस्यां काचनलिकामुखमेकं निवेशयेत् । अपरञ्च मुखं तस्यास्तोयपूर्णोदराऽर्द्धके ॥ १६६ ॥ नीरपूरितपात्रस्थे काचकुम्भेऽपरे न्यसेत् । अतिमन्दानलेनाथ पचेत्खलु विधानवित् ॥ १७० ॥ तिर्यङ्निपातितं चाथ बाष्परूपेण सञ्चितम् । तोयाभं लवणद्रावं रसवैद्यः समाहरेत् ॥ १७१ ॥ अथ लवणद्रावको नवीनैः परिभाषितः—भृष्टचूर्णितसैन्धवस्य ६ भागाः, गन्धकद्रावकस्य ११ भागाः ॥ १६६–१७१ ॥ भा.टी.-एक स्वच्छ पात्र में सैन्धानमक के सूक्ष्मचूर्ण को अच्छी तरह भूनें, जब भुनने पर उसका जलीयांश सूख जाय तो पात्र को चूल्हे से नीचे उतार लें। अब इस भुने हुए सैन्धानमक चूर्ण में से छः भाग चूर्ण लेकर कांच की शीशी में डालें और इसी में धीरे-धीरे ग्यारह भाग गन्धकद्राव भी डालकर मिला दें । अब इस सैन्धानमकवाली शीशी को सुराप्रदीप अथवा चूल्हे के ऊपर रखकर इस शीशी के मुख पर एक तिरछी कांच की नली जोड़ दें और नली का दूसरा मुख एक दूसरी अर्धनलपूरित और शीतल जलयुक्त पात्र के बीच में रखी हुई शीशी के मुख से जोड़ दें । यह शीशी सैन्धानमक वाली शीशी से बड़ी होनी चाहिये । अब सैन्धवचूर्णवाली हांडी के नीचे मन्द-मन्द अग्निताप देकर पकायें । इस प्रकार लवणद्राव वाष्प रूप से तिरछा उड़कर जलवाली शीशी में जल में मिला हुआ प्राप्त होगा। जल के अभाव में इसका प्रयोग होता है ॥ १६६-१७१ ॥ वक्तव्य—लवणद्राव (Hydrochloric acid) सांद्र (Strong) और तरल (Light) भेद से दो प्रकार का होता है। इनमें से आगे कहे जाने- वाले सजललवणद्रावक को तरल या हल्का लवणद्राव कहा जाता है । किन्तु यदि एक भाग जल में ४५० भाग लवणद्राव के वाष्प संचित किये गये हों तो उसे सान्द्र लवणद्रावक कहते हैं । सजललवणद्रावकस्य निर्माणप्रकारः अनलनयनवर्त्म-प्राप्तसङ्ख्याप्रमाणं सलिलममलमादौ काचपात्रे निदध्यात् ।
३५८ रसतरङ्गिणी तदनु खलु विहाय यामिनीरत्नतुल्यं विमललवणाम्लं निक्षिपेद्वैद्यवर्यः ॥ १७२ ॥ अयमेव समाख्यातस्त्वायुर्वेदविशारदैः । सजलो लवणद्रावो विविधातङ्कनाशनः ॥ १७३ ॥ लवणद्रावकस्य चातितीक्ष्णत्वात् सजलद्रावनिर्माणं भक्षणयोग्यतासम्पा- दनाय । परिस्रुतं सलिलं २३ भागिकम्, लवणद्रावकं १० भागिकम् । अयं हि सजललवणद्रावः । स्पष्टमन्यत् ॥ १७२, १७३ ॥ भा.टी.—एक चौड़े मुख के कांच के पात्र में पहिले शुद्ध परिस्रुत जल तेईस भाग डाल लें, अब इस पात्र के जल में धीरे-धीरे दस भाग स्वच्छ लवण द्राव मिलायें तो इसे आयुर्वेदविशारद वैद्य लोग सजललवणद्राव कहते हैं। यह अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करता है ॥ १७२, १७३ ॥ सजललवणद्रावकस्य गुणाः लवणद्रावकस्तीक्ष्णो जाठराग्निप्रदीपनः । मूत्रदोषहरो बल्यो यकृद्दोषनिकृन्तनः ॥ १७४ ॥ भा.टी.—सजललवणद्रावक बहुत तेज होता है। इसके प्रयोग से जठराग्नि प्रदीप्त होती है। मूत्र में पाई जानेवाली अनेक प्रकार की विकृतियों को दूर करता है। इसको समुचित रूप में अन्तःप्रयोग करने से शरीर में बल बढ़ने लगता है, क्योंकि यह यकृत् के सब दोषों को नष्ट करके उसको सबल बनाता है॥१७४॥ वक्तव्य—आमाशय में स्वभावतः ही लवणाम्ल होता है। जब यह आमा- शय का लवणाम्ल किसी तीव्र रोगजन्य निर्बलता के कारण न्यून हो जाता है जिससे भोजन भली प्रकार नहीं पचता और खाये हुए भोजन के उद्गार आते हैं तो ऐसी अवस्था में अन्य पाचक और दीपक औषधियों के साथ भोजन करने के बाद थोड़ा सा लवणाम्ल पिलाया जाता है। अन्य अम्लों के समान ही लव- णाम्ल भी यकृत् को उत्तेजित करता है और पित्त को निकालने में सहायक होता है। सजललवणद्रावकस्य मात्रा आरभ्य पञ्चबिन्दुभ्यो कलाबिन्दुमितं परम् । युञ्जीत लवणद्रावं प्रचुरेणाम्भसा भिषक् ॥ १७५ ॥ मात्रा—पञ्चबिन्दुभ्यः षोडशबिन्दुपर्यन्तम् ॥ १७५ ॥ भा.टी.—सजल लवणद्राव की पांच बूँद से लेकर सोलह बूँद तक की मात्रा को पर्याप्त जल में मिलाकर भोजन के अनन्तर सेवन करना चाहिये ॥१७५॥
चतुर्दशस्तरङ्गः ३५६ अस्य आमयिकः प्रयोगः अन्नस्यामाशयस्थस्य विपाके तु द्वितीयेके। लवणाम्लविहीनत्वादू यदजीर्णं प्रजायते ॥ १७६ ॥ तस्मिन्नजीर्णे मतिमान् रोगिणं कृतभोजनम् । दशबिन्दुमितं युक्त्या पटुद्रावन्तु पाययेत् ॥ १७७ ॥ पानमात्रेण गात्राणां गौरवञ्चाप्यजीर्णकम् । नाशयित्वा बुभुक्षान्तु जनयत्याशु निर्भरम् ॥ १७८ ॥ लवणद्रावकाधिक्यादामाशयसमुद्भवे । अजीर्णे लवणद्रावं भोजनादौ प्रयोजयेत् ॥ १७९ ॥ सक्षारे खलु प्रस्रावे क्षारमेहे च युक्तितः । शीलितो लवणद्रावो निर्दिष्टातङ्कनाशनः ॥ १८० ॥ शीलितस्तु पटुद्रावः शुष्कजिह्वं हतस्वरम् । मृदुप्रलापसहितं हृद्दौर्बल्यसमायुतम् ॥ १८१ ॥ अस्पष्टनाडिकं चैव कदाचिद् द्रुतनाडिकम् । मूत्रणे प्रस्रवद्गूथं नाशयत्यान्त्रिकज्वरम् ॥ १८२ ॥ सततं लवणद्रावो मात्रया परिशीलितः । अफूफसेवनोद्भूतं दौर्बल्यं हन्ति निश्चितम् ॥ १८३ ॥ सजलस्तु पटुद्रावः शीलितः प्रचुराम्भसा । अरुचिं वह्निमान्द्यं च नाशयत्यविकल्पतः ॥ १८४ ॥ आमाशयस्य लवणाम्लहीनत्वाजातमजीर्णञ्चेत् भोजनोत्तरमस्य प्रयोगः, लवणाम्लस्य आधिक्ये तु भोजनात् प्रागेवेति विशेषः। आन्त्रिकज्वरस्य च तासु तासु निर्दिष्टावस्थासु विशेषफलकरः। अहिफेनसेवनजातदौर्बल्यमवश्यमपनयति, प्रचुराम्भसा शीलनं तीक्ष्णतापरिहाराय । एवं च अविकल्पतः निःसन्देहं अरुचिं मन्दाग्निश्च नाशयतीति ॥ १७६–१८४ ॥ इति क्षारविशेषादिविज्ञानीयो नाम चतुर्दशस्तरङ्गः भा.टी.-खाये हुए भोजन के आमाशय में पहुँचने पर उसका द्वितीय विपाक अर्थात् आमाशयिक रस द्वारा पाक होने लगता है। यदि ऐसी अवस्था में आमाशय में लवणाम्ल की कमी के कारण अजीर्ण, आमाशयगुरुता, स्तब्धता, उद्गार आदि हो जाय तो इस प्रकार के अजीर्ण में रोगी को भोजन खिलाकर दस बूँद सजललवणद्राव का पर्याप्त जल में मिलाकर पिला दें। इसके पीने
३६० रसतरङ्गिणी से तत्काल शरीर गौरव तथा अजीर्ण नष्ट होकर पुनः तीव्र क्षुधा मालूम होने लगती है । और यदि आमाशय में लवणाम्ल की अधिकता होने के कारण रोगी को अजीर्ण हो तो उसे भोजन के पूर्व लवणाम्ल को जल में मिलाकर सेवन कराना चाहिये । क्षार प्रमेह में जब मूत्र में क्षारीय तत्त्व अधिक मात्रा में निकलते हों तो लवणद्राव के प्रयोग से इनका निकलना बन्द हो जाता है । आन्त्रिकज्वर ( Typhoid Fever ) में जब रोगी की जिह्वा सूख जाय, स्वर मन्द हो जाय, साधारण प्रलाप और हृदय में दुर्बलता के साथ उसकी नाड़ी की गति कभी स्पष्ट और तीव्र हो और मूत्र में मल आता हो तो इसके प्रयोग से आराम आता है । अफीम सेवन करने से होनेवाली हृदय की दुर्बलता में कुछ दिन तक निरन्तर लवणद्राव का सेवन करने से उक्त हृदयदौर्बल्य मिट जाता है । सजललवणाम्ल को पर्याप्त जल में मिलाकर सेवन करने से अरुचि और अग्निमान्द्य में अवश्य आराम मिलता ॥ १७६-१८४ ॥ यह क्षारविशेषादिविज्ञानीय नाम चतुर्दशतरङ्ग समाप्त हुआ । अथ सुवर्णविज्ञानीयः पञ्चदशतरङ्गः धातुपदस्य निर्वचनम् खालित्यमथ पालित्यं कार्श्यं वार्द्धक्यमेव च । अपनीय दधत्येते देहं तद्धातवः स्मृताः ॥ १ ॥ धातुपदसामान्यनिर्वचनं स्वर्णादीनामौषधप्रयोगयोग्यतासूचनाय । देहधार- कत्वमेव हि धातूनां धातुत्वम् इति ॥ १ ॥ भा.टी.—स्वर्ण, रजत आदि द्रव्यों को धातु शब्द से व्यवहार में लाने का कारण यह है कि इनके प्रयोग से अकाल में होनेवाले खालित्य ( बालों का उड़ना ) पालित्य ( अकाल में ही बालों का सफेद होना ), कृशता (शरीर का सूखना ) तथा बुढ़ापा आदि लक्षण अथवा रोग दूर होकर शरीर दृढ़ और कार्यक्षम (धारण-समर्थ) होता है । अतः इनको धातुशब्द से कहा जाता है॥१॥ वक्तव्य—उक्त धातुनिर्वचन के अतिरिक्त धातुपरीक्षण में तीन मुख्य विशेष- तायें देखी जाती हैं जिससे धातु और अधातु के बीच भेद किया जाता है । १—कोई भी खनिजद्रव्य ( धातु ) आभा और प्रभाववाला होता है । २—धातु न्यूनाधिक रूप में विद्युत् धारा को वहन करनेवाले होते हैं । ३—बिना
पञ्चदशस्तरङ्गः ३६१
रासायनिक विधि से धातु, मद्यसार, तैल, ग्लिसरीन आदि में नहीं घुलते हैं। इससे यह भी धातु शब्द से ज्ञात हो सकता है जो द्रव्य हमारे शरीर में आभा- प्रभा के उत्पादक हों और जिससे हमारे शरीर में विद्युत् धारा वातिक गति हो और जिससे शरीर में रासायनिक परिवर्तन के साथ शरीर की वृद्धि हो वे सब धातु शब्द से कहे जा सकते हैं। इसी परीक्षा से आज तक ६८ धातुओं का वैज्ञानिकों ने पता लगाया है। धातूनां नामपरिगणनम् स्वर्णं तारं तथा ताम्र वाङ्गं सीसकमेव च। यशदं च तथा लोहं सप्तैते धातवः स्मृताः ॥२॥ सुवर्णचन्द्रलोहार्के वङ्गाहियशदायसम् । लोहसप्तकमाख्यातं सप्तलोहञ्च तन्मतम् ॥३॥ धातूनां नामपरिगणनं खनिषूपलभ्यमानानाम्। मिश्रकधातुवर्णनं पृथक् करिष्यते। तारं रजतम्, सुवर्णचन्द्रलोहेत्यादिना प्रकारान्तरेण सप्तलोहनिर्देशः धातुलोहशब्दयोः परस्परं पर्यायनिर्णायकः। प्राचीनतन्त्रेषु लोहशब्देनापि सप्तानां परिगणनात्। तत्र चन्द्रलोहं रजतम्। अर्कस्ताम्रम्। अहिः सीसकम्। स्पष्टमन्यत् ॥ २-३ ॥ भा.टी.—सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, सीसा, जस्ता तथा लोहा, ये सात धातु कहे जाते हैं। इन्हीं को लोहसप्तक अथवा सप्तलोह भी कहा जाता है ॥२-३॥ वक्तव्य—धातुपरिगणन में दो वार एक ही चीज को कहा गया है। इसका अभिप्राय यह है कि धातु और लोह ये दोनों परस्पर पर्यायवाचक हैं। अर्थात् लोह (Iron) को भी कहते हैं और सब स्वर्ण रजत आदि को भी लोह कहा जाता है। क्योंकि प्राचीन ग्रन्थों में कर्षार्थवाची "लृह" धातु से लोह शब्द बनाया गया है। क्योंकि सम्पूर्ण धातुएँ पृथिवी के अन्तराल से कर्षण (निका- लना या खींचना) की जाती हैं। इससे एक दूसरा भाव भी ज्ञात होता है कि पृथ्वि से स्वतन्त्र रूप में प्राप्त होनेवाले लोह को ही धातु शब्द से कहा जाता है; न कि पीतल तथा कांसा मिश्रित धातुओं को। इसीलिए 'रसरत्न-समुच्चय' में धातुओं को तीन भागों में विभक्त किया है। स्वर्ण, चांदी, ताँबा, कान्त तथा फौलाद को शुद्धलोह और सीस तथा रांगा को पूतिलोह और पीतल, कांसा को मिश्रलोह शब्द से लिखा है। धातुओं की संख्या में मतभेद देखा जाता है। शार्ङ्गधर स्वर्ण, रजत, पीतल, तांबा, सीसा, रांगा तथा फौलाद को सात धातु
३६२ रसतरङ्गिणी मानता है । किसी ने पीतल न मानकर कान्त लोह, तीक्ष्णलोह और मुण्डलोह मिलाकर अष्ट धातु माने हैं । रसकामधेनु में स्वर्ण, रजत, ताम्र, तीक्ष्ण वंग तथा नाग (सीसा), ये छह ही धातु लिखे हैं । इन्हीं सब बातों को दृष्टि में रखते हुए धातु को लोह शब्द से कहकर सरलता कर दी गयी है । धातूनां सामान्यः प्रथमः शोधनप्रकारः सूचिवेध्यानि पत्राणि धातूनान्तु समाहरेत् । यावद्वह्निप्रभाणि स्युस्तावद्वह्नौ प्रतापयेत् ॥४॥ स्नपयेत्तप्ततप्तानि काञ्जिके तु त्रिधा त्रिधा । तक्रे कुलत्थकथिते गोमूत्रतिलतैलयोः ॥५॥ एवं विशुद्धिमायान्ति स्वर्णाद्याः सप्तधातवः । समासतः समाख्यातमिदं सामान्यशोधनम् ॥६॥ सामान्य शोधनप्रकारः काञ्जिकतक्रादिना । तत्र नागवङ्गयशदानां गालि- तानां निषेको हण्डिकान्तरे इति वक्ष्यते, इतरेषां पञ्चात्मनैव, विशेषशोधनन्तु तत्र तत्र वक्ष्यत एव । एतच्छोधनञ्च कृत्रिमखनिजदोषयोः शान्त्यर्थम् । अथवा कदली- मूलजले सप्तधा निषेकादपि शुद्धिः । उक्तञ्चान्यत्रापि "सर्वलोहानि तप्तानि कदली- मूलवारिणा । सप्तवारं निषिक्तानि शुद्धिमायान्त्यनुत्तमाम् ।" इति ॥४-६॥ भा.टी.—शोधन करने योग्य धातुओं के पतले-पतले सूचिवेध्य पत्र बना कर कोयलों की अग्निमें लालवर्ण होने तक तपायें, अग्नितप से लाल होने पर उन्हें अग्नि में से निकालकर उसी क्षण काञ्जी में बुझा दें, फिर अग्नि में तपाकर काञ्जी में बुझा दें । इस प्रकार अग्नि में तपाकर तीन बार मठे में तीन बार कुलथक्वाथ में तीन बार तिलतैल में बुझायें । इस प्रकार उक्त द्रवों में तीन, २ बार बुझाने से स्वर्ण आदि सातो धातुओं की शुद्धि हो जाती है । संक्षेपतः यह धातुओं की समान्य शोधनविधि है ॥ ४-६ ॥ वक्तव्य—यद्यपि यहाँ पर सब धातुओं के पत्र बना अग्नि में तपाकर लाल करके उक्त द्रवों में बुझाने को लिखा है, परन्तु तीव्रद्रावि वंग, यशद तथा सीसा इन धातुओं को पिघलाकर द्रवों में बुझाना चाहिए । केवल पत्रों को अग्नि पर रख तपाने से नागादि अग्नि में ही नीचे पिघलकर गिर जायेंगे । उक्त प्रकार से धातुओं का शोधन करने से उनमें पाया जाने वाला मिश्रण तथा खनिजदोष दूर हो जाता है । अतएव अशुद्ध मिश्रितदोषयुक्त धातु बहुत सावधानी के साथ शोधन करने पर भी बहुत घट जाता है ।
पञ्चदशस्तरङ्गः ३६३ द्वितीयः शोधनप्रकारः प्रतप्तानि तु लोहानि रम्भामूलजले भिषक् । निषेचयेत्सप्तवारं विशुद्ध्यन्ति न संशयः ॥ ७ ॥ आ. टी.—सब धातुओं के पत्रों को अग्नि में तपाकर अथवा पात्र में पिघला कर केवल कदलीकन्दस्वरस में सात बार बुझाने से भी उनकी शुद्धि हो जाती है ॥७॥ धातूनां सामान्यो मारणप्रकारः मनःशिलागन्धकसूर्यदुग्धैः संमर्द्य खल्वे खलु सप्तलोहम् । वन्योत्पलाग्नौ पुटितं प्रयत्नादनुत्तमां याति मृतिं ह्यवश्यम् ॥ ८ ॥ प्रसङ्गात् सप्तानामपि मारणप्रकारः—सूर्यदुग्धं अर्कक्षीरम् । उक्तञ्चान्यत्र— “शिलागन्धार्कदुग्धाक्ताः स्वर्णाद्याः सप्तधातवः । म्रियन्ते द्वादशपुटैः सत्यं गुरुवचो यथा” इति ॥ ८ ॥ भा. टी.—सात धातुओं में से किसी एक धातु (शुद्ध धातु) को मैनसिल गन्धक में मिलाकर आक के दूध में घोटकर सुखा लें। अन्त में इसको एक सम्पुट में बन्द करके यथायोग्य फूँक लें। इस प्रकार उक्त द्रव्यों के साथ धातु घोटकर तब तक पुट दें जब तक कि उस धातु की ठीक भस्म न हो जाय। इस विधि से प्रायः सभी धातुओं की भस्म हो जाती है ॥ ८ ॥ अथ स्वर्णस्य नामानि स्वर्णं सुवर्णं द्रविणं हिरण्यं कल्याणकं काञ्चनमग्निवर्णम् । मनोहरं हेम च भूषणार्हं तथाग्निबीजं कनकञ्च कौन्तम् ॥ ९ ॥ भृङ्गारमाङ्गल्यकजाम्बवानि जाम्बूनदं भर्म च जातरूपम् । चाम्पेयकं लोहवरञ्च रुक्मं चामीकरं हाटकसंज्ञमुक्तम् ॥ १० ॥ अथ विशेषतो वर्णनक्रमे प्रथमं सुवर्णनामानि—तन्त्रे व्यवहाराय ॥९,१०॥ भा.टी.—स्वर्ण, सुवर्ण, द्रविण, हिरण्य, कल्याणक, काञ्चन, अग्निवर्ण, मनोहर, हेम, भूषणार्ह, अग्निबीज, कनक, कौन्त, भृंगार, मांगल्यक, जाम्बव, जाम्बूनद, भर्म, जातरूप, चाम्पेयक, लोहवर, रुक्म, चामीकर तथा हाटक; ये सब नाम स्वर्ण (सोना) के कहे जाते हैं ॥६–१०॥ ग्राह्यसुवर्णस्य लक्षणम् बालारुणारुणमलं ज्वलनप्रतप्तं शाणोपले घुमृणचूर्णसमानवर्णम् ।
३६४ रसतरङ्गिणी नाराचिकाधृतमलं गुरुतामुपेयात् स्निग्धं तदेव कनकं कथितं तु जात्यम् ॥ ११ ॥ बालारुणं उदीयमानारुणसमशोभम्, शाणोपले इति निकषग्रावणि, घुसृणं कुंकुमम् । नाराचिका-तुला। जात्यं उत्कृष्टम् । उक्तञ्च—"दाहेऽति- रक्तमथ यत् ससितं च छेदे काश्मीरकान्ति च विभाति निकाषपट्टे । स्निग्धञ्च गौरवमुपैति च यत्तुलायां ग्राह्यं तदेव कनकं मृदु रक्तपीतम् ॥” इति । अपरमपि लक्षणं वैशद्यार्थम् , तथा चाह शुल्वेन्दुवर्जितमिति ताम्ररजतसंयोगरहितम् , जात्या स्वभावतः । उक्तञ्च—“दाहे रक्तं सितं छेदे निकषे कुङ्कुमप्रभम् । तार- शुल्वोज्झितं स्निग्धं कोमलं गुरु हेम सत् ॥” इति ॥११॥ भा.टी.—मिलावट रहित उत्तम स्वर्ण अग्नि में तपाने पर प्रातःकालीन सूर्य के समान लाल-पीले वर्ण का निकलता है । यदि उसे कसौटी पर घिसा जाय तो वह केसर वर्ण की रेखा खींचता है। तौल में अन्य धातुओं की अपेक्षा अधिक भारी होता है और बाहर देखने या स्पर्श करने में चिकना सा होता है । इस प्रकार सब परीक्षाओं में ठीक उतरनेवाले सोने को जात्य ( उत्तम ) स्वर्ण कहा जाता है ॥ ११ ॥ अपरं लक्षणम् कोमलं रक्तपीताभं स्निग्धं शुल्वेन्दुवर्जितम् । गुरु चाखिलधातुभ्यो जात्या तत्स्वर्णमुत्तमम् ॥ १२ ॥ जात्य ( उत्तम ) स्वर्ण, कोमल, रक्तपीताभवर्ण, स्निग्ध, चाँदी और ताँबे की मिश्रण से रहित, अन्य धातुओं की अपेक्षा अधिक भारी होता है ॥ १२ ॥ अग्राह्यसुवर्णस्य स्वरूपम् कठिनं लघु रूक्षञ्च कषे च्छेदेऽनले सितम् । तारताम्रसमायुक्तं स्वर्णं हेयं स्मृतं बुधैः ॥ १३ ॥ त्याज्यस्वर्णरूपम्—कषे छेदे अनले त्रिधापि श्वेतप्रभम् । उक्तञ्च— “यच्छ्वेतं कठिनं रूक्ष विवर्णं समलं दलम् । दाहे छेदे सितं, श्वेतं कषे त्याज्यं लघु स्फुटम् ॥” इति ॥ १३ ॥ भा.टी.—मोड़ने पर या हथौड़े की चोट मारने में कठोर, तौल में हल्का, रूक्षवर्ण, कसौटी पर रगड़ने तथा अग्नि में तपाने तथा काटने पर श्वेतवर्ण दिखानेवाला स्वर्ण अग्राह्य होता है । ऐसे स्वर्ण में रजत ( चाँदी ) तथा ताँबे का मिश्रण पाया जाता है ॥ १३ ॥
पञ्चदशस्तरङ्गः ३६५ सुवर्णशोधनस्य प्रयोजनम् यस्मादशोधितं स्वर्णं हन्ति बुद्धिवलादिकम् । करोति च वहून् रोगान् तस्मात्स्वर्णं विशोधयेत् ॥ १४ ॥ अशुद्धं सुवर्णं यस्मात् भक्षितं बुद्धिवलादिकं हन्ति तस्मात् शोधयेदिति । आहुश्च प्राञ्चः—"बलञ्च वीर्यं हरते नराणां रोगव्रजं पोषयतीह काये । असौख्य- कार्येव सदा सुवर्णमशुद्धमेतन्मरणञ्च कुर्यात् ॥” इति ॥ १४ ॥ भा.टी.—क्योंकि अशुद्ध स्वर्ण के अन्तःप्रयोग करने से बुद्धि, शारीरिक तथा मानसिक बल का ह्रास होता है और शरीर में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होने का भय रहता है, अतः इसके खनिज तथा यौगिक दोषों को दूर करने के लिए इसका शोधन करना चाहिए ॥ १४ ॥ सुवर्णस्य प्रथमः शोधनप्रकारः विततानि विशालानि कर्षैकप्रमितानि तु । सूचिभेद्यानि पत्राणि सुवर्णस्य समाहरेत् ॥ १५ ॥ ततः खल्वम्लपिष्टेन मृत्तिकापञ्चकेन वै । तानि पत्राणि संलिप्य कपोताख्यपुटे पुटेत् ॥ १६ ॥ स्वर्णंसप्तपुटैरेव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् । श्यामिका हीयते चापि तारताम्रादियोगजा ॥ १७ ॥ तत्र प्रथमः शोधनप्रकारः—मृत्तिकापञ्चकम् “वल्मीकमृत्तिका धूमं गैरि- काञ्चेष्टिका पटुः । इत्येता मृत्तिकाः पञ्च” इत्युक्तम् । आहुश्चप्राञ्चः—"मृत्तिकाः पञ्चलुङ्गाम्लैः पञ्चवासरभाविताः । सभस्मलावणाद्वेमं शोधयेद् पुटपाकतः ॥” इति । एवं शोधनफलं श्यामिका हीयते इत्यादि ॥ १५–१७ ॥ भा.टी.—स्वर्ण के बड़े-बड़े चौड़े एक-एक तोले के सूचीवेध्य पत्र बना लें। अब इन पत्रों पर बिजौरानींबू के रस में अच्छी तरह घोटी हुई पञ्चमृत्तिका (बांबी की मिट्टी, घर का धुँआ, गेरु, ईंट का चूर्ण और सैन्धानमक) का लेप करके सुखा लें। सूखने के बाद एक सम्पुट में बन्द करके कपोतपुट की अग्नि में फूक दें। इस प्रकार सात पुट देने से स्वर्णपत्र शुद्ध हो जाते हैं और उनकी चाँदी ताँबा आदि मिश्रणजन्य कालिमा भी नष्ट हो जाती है ॥ १५–१७ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः कर्षोन्मितानीह दलानि हेम्नः खल्वम्लपिष्टेन ससैन्धवेन । वन्योपलोत्थेन तु भस्मना वै प्रलेपयेल्लेपविधानदक्षः ॥ १८ ॥
६३६ रसतरङ्गिणी लेपं प्रशुष्कं प्रसमीक्ष्य वैद्यः शरावसंस्थानि तु कोकिलाग्नौ । पुटेत्पुटे कुक्कुटसंज्ञके तु स्वर्णं भवेच्छोडशवर्णतुल्यम् ॥१९॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः—कोकिला अङ्गाराः षोडशवर्णं उज्ज्वलरक्तसर्वां- शशुद्धम् ॥ १८, १६ ॥ भा.टी.—एक तोले परिमाण के स्वर्ण के पत्रों पर सैन्धानमक, जंगली उपलों की राख बिजौरानीबू के रस में घोटकर इसका लेप कर दें । जब इन पर का लेप सूख जाय तो इन्हें एक शराव में रखकर कुक्कुटपुट की कोयलों की अग्नि में पुट देवें तो स्वर्ण सर्वांश शुद्ध उज्ज्वल रक्तवर्ण हो जाता है ॥१८-१६॥ तृतीयः शोधनप्रकारः सूचीवेध्यानि पत्राणि सुवर्णस्य समाहरेत् । कर्तर्या कर्तयेच्चाथ कणान् सूक्ष्मांस्तु कारयेत् ॥ २० ॥ मृल्लिप्ते काचपात्रे च न्यसेत्स्वर्णकणांस्ततः । त्रिपादिकायां विन्यस्य सुरादीपाग्निना पचेत् ॥ २१ ॥ लवणद्रावकं तत्र निक्षिपेत्तु शनैः शनैः । सोरकद्रावकञ्चाथ पूर्वद्रावस्य पादिकम् ॥ २२ ॥ विधिज्ञो निक्षिपेद्यावद् द्रवतां याति काञ्चनम् । किञ्चित्कालं पचेच्चाथ द्रवाधिक्यनिवृत्तये ॥ २३ ॥ सलिलञ्चाथ निक्षिप्य पचेदथ विधानवित् । सजलं चणकाम्लञ्च तावत्तत्र विनिक्षिपेत् ॥ २४ ॥ यावत्खलु सुवर्णस्य चणकाम्लस्य योगतः । अतिसूक्ष्मकणं चूर्णं पात्राधः पतितं भवेत् ॥ २५ ॥ विनश्यत्यम्लता यावत् तावत्प्रक्षालयेज्जलैः । संशोष्य चाथ मतिमान् विशुद्धं स्वर्णमाहरेत् ॥ २६ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारो नवीनैः परिभाषितः—काचपात्रस्य मृदा लेपः वह्नितापसहत्वसम्पादनाय । सुरादीपपरिचयः पूर्वमुक्तः, सुरादीपप्रयोगश्च स्थिर- तासम्पादनाय । शनैः शनैः लवणद्रावकप्रक्षेपः सुवर्णगालनयोग्यताज्ञानाय । चणकाम्लकं चणकद्रुमनिपतितावश्यायपाकजातम् “Oxalic Acid” इत्याङ्ग्ल- भाषायाम् । स्पष्टमन्यत् ॥ २०-२६ ॥ भा.टी.—पहिले स्वर्ण के सूचीवेध्य पत्रों को लेकर इनको कैंची से काटकर इनके बहुत छोटे टुकड़े बना लें । अब इन टुकड़ों को मिट्टी से लिप्त किये