रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३ चतुर्दशस्तरङ्गः ३५३ मृल्लिप्तायां क्षुद्रकण्ठ्यां हण्डिकायां तु विन्यसेत् । चुल्लिकायां निधायाथ विधानज्ञो भिषग्वरः ॥१४५॥ प्रज्वाल्य तीव्रज्वलनं पच्चेद्वोराद्वयं भिषक् । हण्डिकाया मध्यभागो यावदायाति रक्तताम् ॥१४६॥ क्षिपेत्ततः क्रमेणैव शेषं चूर्णं भिषग्वरः । प्रखरेणानलेनाथ यामद्वितयमात्रकम् ॥१४७॥ विपचेदविरतं रसतन्त्रविधानवित् । स्वतः शीते च लवणं बिडाख्यन्तु समाहरेत् ॥१४८॥ चतुर्विंशतिसङ्ख्याकसेरकप्रमितं शुभम् । ततः सर्वेषु योगेषु योजयेद्भिषजां वरः ॥१४९॥ निर्माणप्रकारः कृत्रिमत्वादस्य निर्दिष्टः-रोमकलवणं २८ सेरकम्, आम- लकचूर्णम् ५० तोलकम्, यथानिर्देशं पाकः, पूर्वे चतुर्थांशमात्रपाकः । अत्र च लवणजलांशशोषात् आमलकीचूर्णभस्मीभावाच्च २४ सेरकमितं लवणमात्रमव- शिष्यते इति विशेषः । स्पष्टमन्यत् ॥१४३-१४६॥ भा.टी.-अट्ठाईस सेर सांभरनमक को अच्छी तरह पीस कर इसमें पचास तोले सूखे हुए आँवलों का चूर्ण मिलाकर रखलें । अब इस चूर्ण में से चतु- र्थांश चूर्ण लेकर एक अच्छी तरह कपड़मिट्टी की हुई मिट्टी की संकुचित मुख- वाली हाँड़ी में डालकर इस हाँड़ी को चूल्हे पर चढ़ाकर दो घण्टे तक बहुत तेज अग्नि से पकायें । जब अग्नितप से हाँड़ी का मध्यभाग खूब लाल दीखने लगे तो उस हाँड़ी में फिर धीरे-धीरे सब अवशिष्ट चूर्ण को डालकर छः घण्टे तक तेज अग्नि से लगातार पकायें, जब अग्नि देना बन्द करने पर हाँड़ी स्वांगशीत हो जाय तो उसे नीचे उतार उसमें से बिडलवण को निकाल लें । उक्त विधान से बनाया हुआ बिडलवण द्रव्य परिमाण के अनुसार पूरी तौल में न होकर चौबीस सेर तौल में प्राप्त होता है । इस प्रकार बनाये हुए बिड- लवण को लिखित योगों में प्रयुक्त करना चाहिये ॥१४३-१४६॥ वक्तव्य -अट्ठाईस सेर और पचास तोले के स्थान पर केवल चौबीस सेर नमक तय्यार होने का कारण यह है कि तीव्र अग्नि से पकाने से साँभरनमक तथा आमलकी चूर्ण में होनेवाला जलीयांश (चार से पचास तोला) सूख जाता है और आमलकी चूर्ण की भस्म हो जाती है ।