रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५२ रसतरङ्गिणी अथ विडलवणस्य नामानि विडं कृत्रिमकञ्चैव सुपाक्यं द्राविडन्तथा । आसुरञ्च विटञ्चाथ धूर्त्तञ्च कृतकं मतम् ॥१४०॥ अथ विडलवणपरिचयः—कृत्रिमकं न स्वाभाविकमपि तु योगविशेषजात- मित्यर्थः ॥ १४० ॥ भा.टी.—विडलवण को विड, कृत्रिमक ( बनावटी ), सुपाक्य, द्राविड, आसुर, विट, धूर्त्त तथा कृतक नाम से व्यवहार किया जाता है ॥ १४० ॥ वक्तव्य—विडलवण सैन्धानमक की भाँति स्वाभाविक रूप से कहीं खान आदि से प्राप्त नहीं होता है, किन्तु इसे बनाया जाता है, अतः इसको कृतक- लवण या कृत्रिमकलवण कहा जाता है । अस्य गुणाः विडं रुच्यञ्च तीक्ष्णोष्णं सूक्ष्मं लघु च दीपनम् । सक्षारं हृद्यमूर्ध्वाधः कफवातानुलोमनम् ॥१४१॥ अजीर्णानाहविष्टम्भहरं शूलविबन्धजित् । हृद्गौरवप्रशमनं वातघ्नञ्च प्रकीर्त्तितम् ॥१४२॥ कफवातयोरुपर्य्यधो यथामार्गप्रवर्त्तनात् अनुलोमकम् । वातघ्नञ्च प्रकीर्त्तितं पूर्वतनैरिति शेषः ॥ १४०–१४२ ॥ भा.टी.—विडलवण खाने में अच्छा लगता है और अन्न में रुचि उत्पन्न करता है । तीक्ष्ण तथा उष्ण गुण युक्त, सूक्ष्म (क्षार के समान सूक्ष्म भाग व स्थानों मे सरलता से प्रवेश करनेवाला ), लघु ( शीघ्र पच जानेवाला या हल्कापन करनेवाला ) अग्निदीपक और क्षारीय रसयुक्त होता है । इसके अन्तः- प्रयोग से ऊपर की तरफ कफ प्रवृत्ति ( निकला ) और नीचे गुदा की तरफ अपानवायु की प्रवृत्ति होती है । अजीर्ण, आध्मान, विष्टब्धाजीर्ण मिट जाते हैं । इसके प्रयोग से साधारण उदरशूल, मलबन्ध, अजीर्णजन्य हृदय रोग और वायु का शमन होता है ॥ २४१, १४२ ॥ बिडलवणस्य प्रथमो निर्माणप्रकारः वस्वृत्तिसेरकमितं लवणं रोमकाभिधम् । पञ्चाशत्तोलकमितं चूर्णमामलकोद्भवम् ॥ १३ ॥ समादाय भिषग्वर्य्यस्ततः सम्मेलयेद् भृशम् । ततः खल्वस्य चूर्णस्य चतुर्थांशं विधानवित् ॥ १४४ ॥