भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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चतुर्दशस्तरङ्गः ३५१ संयुक्तं कठिनस्पर्शं ह्यतीसारादिवर्जितम् । यकृद्दाल्युदरं नूतनं प्लीहोदरमलं हरेत् ॥१३६॥ यकृत् प्लीहाहरं विशेषतः । कोष्णवारिणा प्रयोगः चीत्कारयुतया व्यथया इति असह्यतीव्रपीडयेति यावत् । प्लीहोदरं अलम् इति च्छेदः । अलमत्य- र्थम् ॥ १३४-१३६ ॥ भा.टी.-आधे मासे अर्कलवण को गुनगुने जल से प्रतिदिन सेवन करते हुये यदि मनुष्य (रोगी) अच्छी तरह पथ्य भोजनादि को ग्रहण करता रहे तो इसके प्रयोग से वातिक या श्लैष्मिक यकृत् (लीवर) की खराबी और नवीन प्लीहोदर में जिनमें ज्वर हो या न हो, मलबन्ध हो, यकृत् में पीड़ा के कारण रोगी चिल्लाता पुकार करता हो और स्पर्श में यकृत् अतिकठिन हो और अतिसार आदि लक्षण न हो तो ऐसी अवस्था में उक्त अर्कलवण अवश्य लाभ करता है॥१३४-१३६॥ अथ सामुद्रलवणस्य नामानि सामुद्रं लवणं ख्यातं समुद्रजलसम्भवम् । समुद्रजं सागरजं मतं सामुद्रकञ्च तत् ॥१३७॥ भा.टी.-समुद्रलवण को समुद्रजलसम्भव, समुद्रज, सागरज, सामुद्रक, नाम से व्यवहार किया जाता है ॥ १३७ ॥ अस्य गुणाः समुद्रलवणं हृद्यं रुच्यं स्निग्धञ्च दीपनम् । साक्षारं भेदि वातघ्नं नात्युष्णं नातिशीतलम् ॥ १३८ ॥ भा.टी.-समुद्रलवण हृदय के लिये लाभकारी, अन्न में रुचि उत्पन्न करनेवाला, स्निग्ध, अग्निदीपक, क्षारीय स्वाद युक्त, पतला दस्त लानेवाला, वातशामक और न गरम नाति शीतल अर्थात् समशीतोष्ण प्रकृति का होता है ॥ १३ ॥ समुद्रलवणस्य परिचयः समुद्रजलसंशोषाल्लवणं जायते तु यत् । सामुद्रं लवणं तत्तु समाख्यातं भिषग्वरैः ॥ १३६ ॥ अथ समुद्रलवणपरिचय—ख्यातं प्रसिद्धम् । समुद्रजलसंशोषादिति तस्यो- त्पत्तिपरिचयः ॥ १३६ ॥ भा.टी.—क्योंकि इस समुद्रनमक को समुद्रीयजल को एक लोहपात्र में भरकर अग्नि पर चढ़ा कर जलीयांश को सुखाकर तैयार किया जाता है, अतः वैद्य लोग इसको समुद्रलवण कहते हैं ॥ १३६ ॥