भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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३५४ रस्तरङ्गिणी बिडलवणस्य द्वितीयो निर्माणप्रकारः अशीतितोलकमितं लवणं रोमकाभिधम् । चूर्णमामलकोद्भूतं दशतोलकसंमितम् ॥१५०॥ मृल्लिप्तदृढहण्डिकायां तु विन्यस्य प्रखराग्निना । यामद्वयं विपाच्याथ स्वाङ्गशीतमथोद्धरेत् ॥१५१॥ विडाभिधं तु लवणं रसतन्त्रविधानवित् । अनुभूतोऽति सुगमः प्रकारोऽयं प्रकाशितः ॥१५२॥ भा. टी.—अस्सी तोला रोमकलवण (साँभर नमक) और दस तोला सूखे हुए आँवलों का चूर्ण लेकर दोनों को एकत्र पीस लें और एक कपड़मिट्टी की हुई मजबूत मिट्टी की संकुचित गलेवाली हाँडी में डालकर चूल्हे में छः घंटे की तीव्र अग्नि से पकायें, छः घंटे के बाद हाँडी के स्वांगशीत होने पर उसमें से बिडलवण को निकाल लें। बिडलवण बनाने का यह अतिसरल अनुभूत क्रम है ॥१५०–१५२॥ अथ सौवर्चललवणस्य नामानि सौवर्चलं च रुचकं रुच्यकं हृद्यगन्धकम् । अक्षघ्नं कृष्णलवणं वै काललवणं स्मृतम् ॥१५३॥ सौवर्चल, रुचक, रुच्यक, हृद्यगन्धक, अक्ष, कृष्णलवण तथा काललवणः ये सब नाम काले नमक के कहे जाते हैं ॥१५३॥ अस्य गुणाः सौवर्चलं मतं हृद्यं पाचनं दीपनं परम् । रोचनं भेदनञ्चापि विशदं वातनाशनम् ॥१५४॥ सस्नेहं लघु गुल्मघ्नं तूर्ध्ववातानुलोमनम् । विबन्धानाहशूलघ्नं जन्त्वरोचकनाशनम् ॥१५५॥ सौवर्चलम्—विशदं पैच्छिल्यरहितम् ॥१५४–१५५॥ भा.टी.—सौवर्चलनमक हृद्य, उत्तम, दीपन, पाचन और खाने में अच्छा लगनेवाला होता है। यह भेदन (कब्ज दूर करनेवाला) विशदगुण और वातशामक होता है। यह किञ्चित् स्निग्ध, लघुपाकी, गुल्महर और ऊर्ध्ववातानु- लोमक अर्थात् शुद्ध डकार लानेवाला है। इसके प्रयोग से मलबन्ध, आनाह (अफारा) तथा उदरशूल नष्ट होते हैं। यह उदरकृमि तथा अरुचि को नष्ट करता है ॥१५४–१५५॥