भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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३६४ रसतरङ्गिणी नाराचिकाधृतमलं गुरुतामुपेयात् स्निग्धं तदेव कनकं कथितं तु जात्यम् ॥ ११ ॥ बालारुणं उदीयमानारुणसमशोभम्, शाणोपले इति निकषग्रावणि, घुसृणं कुंकुमम् । नाराचिका-तुला। जात्यं उत्कृष्टम् । उक्तञ्च—"दाहेऽति- रक्तमथ यत् ससितं च छेदे काश्मीरकान्ति च विभाति निकाषपट्टे । स्निग्धञ्च गौरवमुपैति च यत्तुलायां ग्राह्यं तदेव कनकं मृदु रक्तपीतम् ॥” इति । अपरमपि लक्षणं वैशद्यार्थम् , तथा चाह शुल्वेन्दुवर्जितमिति ताम्ररजतसंयोगरहितम् , जात्या स्वभावतः । उक्तञ्च—“दाहे रक्तं सितं छेदे निकषे कुङ्कुमप्रभम् । तार- शुल्वोज्झितं स्निग्धं कोमलं गुरु हेम सत् ॥” इति ॥११॥ भा.टी.—मिलावट रहित उत्तम स्वर्ण अग्नि में तपाने पर प्रातःकालीन सूर्य के समान लाल-पीले वर्ण का निकलता है । यदि उसे कसौटी पर घिसा जाय तो वह केसर वर्ण की रेखा खींचता है। तौल में अन्य धातुओं की अपेक्षा अधिक भारी होता है और बाहर देखने या स्पर्श करने में चिकना सा होता है । इस प्रकार सब परीक्षाओं में ठीक उतरनेवाले सोने को जात्य ( उत्तम ) स्वर्ण कहा जाता है ॥ ११ ॥ अपरं लक्षणम् कोमलं रक्तपीताभं स्निग्धं शुल्वेन्दुवर्जितम् । गुरु चाखिलधातुभ्यो जात्या तत्स्वर्णमुत्तमम् ॥ १२ ॥ जात्य ( उत्तम ) स्वर्ण, कोमल, रक्तपीताभवर्ण, स्निग्ध, चाँदी और ताँबे की मिश्रण से रहित, अन्य धातुओं की अपेक्षा अधिक भारी होता है ॥ १२ ॥ अग्राह्यसुवर्णस्य स्वरूपम् कठिनं लघु रूक्षञ्च कषे च्छेदेऽनले सितम् । तारताम्रसमायुक्तं स्वर्णं हेयं स्मृतं बुधैः ॥ १३ ॥ त्याज्यस्वर्णरूपम्—कषे छेदे अनले त्रिधापि श्वेतप्रभम् । उक्तञ्च— “यच्छ्वेतं कठिनं रूक्ष विवर्णं समलं दलम् । दाहे छेदे सितं, श्वेतं कषे त्याज्यं लघु स्फुटम् ॥” इति ॥ १३ ॥ भा.टी.—मोड़ने पर या हथौड़े की चोट मारने में कठोर, तौल में हल्का, रूक्षवर्ण, कसौटी पर रगड़ने तथा अग्नि में तपाने तथा काटने पर श्वेतवर्ण दिखानेवाला स्वर्ण अग्राह्य होता है । ऐसे स्वर्ण में रजत ( चाँदी ) तथा ताँबे का मिश्रण पाया जाता है ॥ १३ ॥

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