भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पञ्चदशस्तरङ्गः ३६५ सुवर्णशोधनस्य प्रयोजनम् यस्मादशोधितं स्वर्णं हन्ति बुद्धिवलादिकम् । करोति च वहून् रोगान् तस्मात्स्वर्णं विशोधयेत् ॥ १४ ॥ अशुद्धं सुवर्णं यस्मात् भक्षितं बुद्धिवलादिकं हन्ति तस्मात् शोधयेदिति । आहुश्च प्राञ्चः—"बलञ्च वीर्यं हरते नराणां रोगव्रजं पोषयतीह काये । असौख्य- कार्येव सदा सुवर्णमशुद्धमेतन्मरणञ्च कुर्यात् ॥” इति ॥ १४ ॥ भा.टी.—क्योंकि अशुद्ध स्वर्ण के अन्तःप्रयोग करने से बुद्धि, शारीरिक तथा मानसिक बल का ह्रास होता है और शरीर में अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होने का भय रहता है, अतः इसके खनिज तथा यौगिक दोषों को दूर करने के लिए इसका शोधन करना चाहिए ॥ १४ ॥ सुवर्णस्य प्रथमः शोधनप्रकारः विततानि विशालानि कर्षैकप्रमितानि तु । सूचिभेद्यानि पत्राणि सुवर्णस्य समाहरेत् ॥ १५ ॥ ततः खल्वम्लपिष्टेन मृत्तिकापञ्चकेन वै । तानि पत्राणि संलिप्य कपोताख्यपुटे पुटेत् ॥ १६ ॥ स्वर्णंसप्तपुटैरेव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् । श्यामिका हीयते चापि तारताम्रादियोगजा ॥ १७ ॥ तत्र प्रथमः शोधनप्रकारः—मृत्तिकापञ्चकम् “वल्मीकमृत्तिका धूमं गैरि- काञ्चेष्टिका पटुः । इत्येता मृत्तिकाः पञ्च” इत्युक्तम् । आहुश्चप्राञ्चः—"मृत्तिकाः पञ्चलुङ्गाम्लैः पञ्चवासरभाविताः । सभस्मलावणाद्वेमं शोधयेद् पुटपाकतः ॥” इति । एवं शोधनफलं श्यामिका हीयते इत्यादि ॥ १५–१७ ॥ भा.टी.—स्वर्ण के बड़े-बड़े चौड़े एक-एक तोले के सूचीवेध्य पत्र बना लें। अब इन पत्रों पर बिजौरानींबू के रस में अच्छी तरह घोटी हुई पञ्चमृत्तिका (बांबी की मिट्टी, घर का धुँआ, गेरु, ईंट का चूर्ण और सैन्धानमक) का लेप करके सुखा लें। सूखने के बाद एक सम्पुट में बन्द करके कपोतपुट की अग्नि में फूक दें। इस प्रकार सात पुट देने से स्वर्णपत्र शुद्ध हो जाते हैं और उनकी चाँदी ताँबा आदि मिश्रणजन्य कालिमा भी नष्ट हो जाती है ॥ १५–१७ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः कर्षोन्मितानीह दलानि हेम्नः खल्वम्लपिष्टेन ससैन्धवेन । वन्योपलोत्थेन तु भस्मना वै प्रलेपयेल्लेपविधानदक्षः ॥ १८ ॥

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