रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशस्तरङ्गः ३६३ द्वितीयः शोधनप्रकारः प्रतप्तानि तु लोहानि रम्भामूलजले भिषक् । निषेचयेत्सप्तवारं विशुद्ध्यन्ति न संशयः ॥ ७ ॥ आ. टी.—सब धातुओं के पत्रों को अग्नि में तपाकर अथवा पात्र में पिघला कर केवल कदलीकन्दस्वरस में सात बार बुझाने से भी उनकी शुद्धि हो जाती है ॥७॥ धातूनां सामान्यो मारणप्रकारः मनःशिलागन्धकसूर्यदुग्धैः संमर्द्य खल्वे खलु सप्तलोहम् । वन्योत्पलाग्नौ पुटितं प्रयत्नादनुत्तमां याति मृतिं ह्यवश्यम् ॥ ८ ॥ प्रसङ्गात् सप्तानामपि मारणप्रकारः—सूर्यदुग्धं अर्कक्षीरम् । उक्तञ्चान्यत्र— “शिलागन्धार्कदुग्धाक्ताः स्वर्णाद्याः सप्तधातवः । म्रियन्ते द्वादशपुटैः सत्यं गुरुवचो यथा” इति ॥ ८ ॥ भा. टी.—सात धातुओं में से किसी एक धातु (शुद्ध धातु) को मैनसिल गन्धक में मिलाकर आक के दूध में घोटकर सुखा लें। अन्त में इसको एक सम्पुट में बन्द करके यथायोग्य फूँक लें। इस प्रकार उक्त द्रव्यों के साथ धातु घोटकर तब तक पुट दें जब तक कि उस धातु की ठीक भस्म न हो जाय। इस विधि से प्रायः सभी धातुओं की भस्म हो जाती है ॥ ८ ॥ अथ स्वर्णस्य नामानि स्वर्णं सुवर्णं द्रविणं हिरण्यं कल्याणकं काञ्चनमग्निवर्णम् । मनोहरं हेम च भूषणार्हं तथाग्निबीजं कनकञ्च कौन्तम् ॥ ९ ॥ भृङ्गारमाङ्गल्यकजाम्बवानि जाम्बूनदं भर्म च जातरूपम् । चाम्पेयकं लोहवरञ्च रुक्मं चामीकरं हाटकसंज्ञमुक्तम् ॥ १० ॥ अथ विशेषतो वर्णनक्रमे प्रथमं सुवर्णनामानि—तन्त्रे व्यवहाराय ॥९,१०॥ भा.टी.—स्वर्ण, सुवर्ण, द्रविण, हिरण्य, कल्याणक, काञ्चन, अग्निवर्ण, मनोहर, हेम, भूषणार्ह, अग्निबीज, कनक, कौन्त, भृंगार, मांगल्यक, जाम्बव, जाम्बूनद, भर्म, जातरूप, चाम्पेयक, लोहवर, रुक्म, चामीकर तथा हाटक; ये सब नाम स्वर्ण (सोना) के कहे जाते हैं ॥६–१०॥ ग्राह्यसुवर्णस्य लक्षणम् बालारुणारुणमलं ज्वलनप्रतप्तं शाणोपले घुमृणचूर्णसमानवर्णम् ।