रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५६ रसतरङ्गिणी रोमकम्—रोमानदीसमीपे जायमानत्वात् । शाकम्भरह्रदोऽजमेरनिकटवर्ती सांभरनाम्ना प्रसिद्धः ॥ १६१, १६२ ॥ भा.टी.—रोमक नमक पहिले पहल रोम नदी के किनारे पाया गया था, अतः वैद्य लोगों ने इसको रोमक नाम से व्यवहार करना आरम्भ कर दिया । और आजकल यह शाकम्भर (सांभर) ह्रद (बड़े तालाब) के जल से बनाया जाता है, अतः वैद्य लोग इसको शाकम्भरीय (सांभर) नाम से कहने लगे हैं ॥ १६१, १६२ ॥ वक्तव्य—आजकल यह लवण जोधपुर स्टेट में अजमेर के पास सांभर झील (लेक) में बनाया जाता है । अर्थात् वहाँ के स्वाभाविक नमकीन जल- वाले तालाब को काटकर बाहर बनी हुई क्यारियों में डालकर बनाया जाता है । इस तरह वहाँ से लाखों मन प्रतिवर्ष यह नमक बाहर भेजा जाता है । अस्य गुणाः साम्भरं लवणं ख्यातं भेदनं दीपनं परम् । अत्युष्णं लघु तीक्ष्णञ्च कटुपाकि च पित्तलम् ॥ १६३ ॥ मलदोषहरं सूक्ष्ममर्शोघ्नं वातनाशनम् । कफप्रणाशनञ्चैव विशदं कोष्ठशोधनम् । १६४ ॥ भा.टी.—सांभरनमक भेदन और अत्यन्त दीपक है । यह गुणों में अति उष्ण, लघु और तीक्ष्ण होने से पित्तवर्धक, और विपाक में कटु माना जाता है। इसके प्रयोग से मलदोष (अत्यन्त दुर्गन्धि, आमगन्धि, पिच्छिलता आदि) दूर होते हैं और सूक्ष्म स्रोतोऽनुगामी, अर्श तथा वातनाशक, कफनाशक, पिच्छि- लतारहित और कोष्ठशोधक है ॥ १६३, १६४ ॥ अथ लवणद्रावस्य नामानि लवणद्रावकः ख्यातो लवणाम्लसमाह्वयः । पटुद्रावश्च कथितः पटुकद्रावकस्तथा ॥ १६५ ॥ भा.टी.—लवणद्रावक, लवणाम्ल, पटुद्राव तथा पटुकद्रावक; ये सब नाम लवण द्राव अर्थात् Hydrochloric acid के कहे जाते हैं ॥ १६५ ॥ लवणद्रावस्य निर्माणप्रकारः सुचूर्णितं सैन्धवन्तु भाजने भर्जयेद्भिषक् । जलीयांशे विनिष्क्रान्ते चुल्लीतस्त्ववतारयेत् ॥ १६६ ॥ षडभागसंमितञ्चाथ भृष्टचूर्णितसैन्धवम् । काचकुप्यां निधायाथ विधानज्ञो भिषग्वरः ॥ १६७ ॥