भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३५८ रसतरङ्गिणी तदनु खलु विहाय यामिनीरत्नतुल्यं विमललवणाम्लं निक्षिपेद्वैद्यवर्यः ॥ १७२ ॥ अयमेव समाख्यातस्त्वायुर्वेदविशारदैः । सजलो लवणद्रावो विविधातङ्कनाशनः ॥ १७३ ॥ लवणद्रावकस्य चातितीक्ष्णत्वात् सजलद्रावनिर्माणं भक्षणयोग्यतासम्पा- दनाय । परिस्रुतं सलिलं २३ भागिकम्, लवणद्रावकं १० भागिकम् । अयं हि सजललवणद्रावः । स्पष्टमन्यत् ॥ १७२, १७३ ॥ भा.टी.—एक चौड़े मुख के कांच के पात्र में पहिले शुद्ध परिस्रुत जल तेईस भाग डाल लें, अब इस पात्र के जल में धीरे-धीरे दस भाग स्वच्छ लवण द्राव मिलायें तो इसे आयुर्वेदविशारद वैद्य लोग सजललवणद्राव कहते हैं। यह अनेक प्रकार के रोगों को नष्ट करता है ॥ १७२, १७३ ॥ सजललवणद्रावकस्य गुणाः लवणद्रावकस्तीक्ष्णो जाठराग्निप्रदीपनः । मूत्रदोषहरो बल्यो यकृद्दोषनिकृन्तनः ॥ १७४ ॥ भा.टी.—सजललवणद्रावक बहुत तेज होता है। इसके प्रयोग से जठराग्नि प्रदीप्त होती है। मूत्र में पाई जानेवाली अनेक प्रकार की विकृतियों को दूर करता है। इसको समुचित रूप में अन्तःप्रयोग करने से शरीर में बल बढ़ने लगता है, क्योंकि यह यकृत् के सब दोषों को नष्ट करके उसको सबल बनाता है॥१७४॥ वक्तव्य—आमाशय में स्वभावतः ही लवणाम्ल होता है। जब यह आमा- शय का लवणाम्ल किसी तीव्र रोगजन्य निर्बलता के कारण न्यून हो जाता है जिससे भोजन भली प्रकार नहीं पचता और खाये हुए भोजन के उद्गार आते हैं तो ऐसी अवस्था में अन्य पाचक और दीपक औषधियों के साथ भोजन करने के बाद थोड़ा सा लवणाम्ल पिलाया जाता है। अन्य अम्लों के समान ही लव- णाम्ल भी यकृत् को उत्तेजित करता है और पित्त को निकालने में सहायक होता है। सजललवणद्रावकस्य मात्रा आरभ्य पञ्चबिन्दुभ्यो कलाबिन्दुमितं परम् । युञ्जीत लवणद्रावं प्रचुरेणाम्भसा भिषक् ॥ १७५ ॥ मात्रा—पञ्चबिन्दुभ्यः षोडशबिन्दुपर्यन्तम् ॥ १७५ ॥ भा.टी.—सजल लवणद्राव की पांच बूँद से लेकर सोलह बूँद तक की मात्रा को पर्याप्त जल में मिलाकर भोजन के अनन्तर सेवन करना चाहिये ॥१७५॥

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