भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३६८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—सुवर्णमण्डल, स्वर्णमण्डल, स्वर्णपत्रक, सुवर्णपटल और स्वर्ण- दल ये सब नाम सोने के वर्कों के कहे जाते हैं ॥ ३० ॥ सुवर्णमण्डलस्य गुणाः स्वर्णमण्डलमायुष्यं वह्निमान्द्यविनाशनम् । आक्षेपशमनं नेत्र्यं वीर्यवृद्धिकरं परम् ॥ ३१ ॥ अम्लपित्तापहं हृद्यं विपाके स्वादु शीतलम् । हिक्कानाहविषश्लेष्मक्षयशूलव्रणापहम् ॥ ३२ ॥ सुवर्णमण्डलं अम्लपित्तापहमिति विशेषः । समानमन्यत् ॥ ३१-३२ ॥ भा.टी.—सोने के वर्क जीवनवर्धक, अग्निमान्द्यहर वातप्रकोपजन्य आक्षे- पक, नेत्रज्योतिवर्धक, वीर्यवृद्धिकर होते हैं। इसके प्रयोग से अम्लपित्त शान्त हो जाता है। हृदय को बल मिलता है। स्वर्णपत्र विपाक क्रिया में मधुर और शीतल गुणवाले होते हैं। इसके अतिरिक्त हिचकी, आनाह, विषविकार, श्लेष्म- क्षय, वातिकशूल तथा पुरातन व्रणों को नष्ट करते हैं ॥ ३१, ३२ ॥ सुवर्णपटलस्य प्रयोगविधिः सुवर्णपटलं सम्यक् सितया परिपेषितम् । तत्तद्रोगघ्नभैषज्ययुतं तत्तद्गदापहम् ॥ ३३ ॥ सुवर्णपटलं सितया खण्डेन परिपेषितं तत्तद्रोगनाशकभेषजयोगेषु योज्यम् । आहुश्च प्राचीनाः— “अपक्वहेम सङ्घृष्टं शिलायां जलयोगातः । द्रवरूपन्तु तत्पेयं मधुना गुणदायकम् ॥ यद्वापि तबकाख्यन्तु स्वर्णपत्रं विचूर्णितम् । मधुना संगृ- हीतं चेत् सद्यो हन्ति विषादिकम् ॥” इति । “न सज्जते हेमपाङ्गे पद्मपत्रेऽम्बुवद् विषम्” इति च वाग्भटः ॥ ३३ ॥ भा.टी.—सोने के वर्क को खाँड में लपेट कर, भिन्न-भिन्न रोगनाशक औषधियों के साथ प्रयोग करने पर तत्तद्-रोगों में लाभ होता है ॥ ३३ ॥ अथ सुवर्णलवणस्य नामानि. सुवर्णलवणं स्वर्णलवणञ्चापि तन्मतम् । हिरण्यलवणञ्चैव समाख्यातं भिषग्वरैः ॥ ३४ ॥ भा. टी.—सुवर्णलवण, स्वर्णलवण और हिरण्यलवण, ये सब नाम ( Goldchloride ) के कहे जाते हैं ॥ ३४ ॥ वक्तव्य—सुवर्णलवण विशुद्ध आयुर्वेदीय योग न होकर भी अत्यन्त गुण-