भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 398

३७२ रसतरङ्गिणी गया है तो उसमें एक कर्ष परिमाण रससिन्दूर डालकर नीचे उतार लें और इसको बिजौरानींबू के रस से खूब मर्दन करके सूक्ष्मचूर्ण रूप में कर लें और फिर इसमें स्वर्ण के समभाग शुद्ध हिंगुलचूर्ण मिलाकर एक छोटे से सम्पुट में बन्द करके कुक्कुटपुट की अग्नि में फूँक दें । इस तरह बारह कुक्कुटपुट देने से शीघ्र ही स्वर्ण की अतिसूक्ष्म केसरवर्ण की निश्चन्द्र भस्म बन जाती है ॥४५-४८॥ वक्तव्य—स्वर्ण को मूषा में पिघलाकर खरल में पड़े रससिन्दूर या पारद- भस्म में डालकर शीघ्र ही रगड़ने से स्वर्ण चूर्णरूप में हो जाता है । अब इसे बिजौरानींबू के रस से घोंटकर हिंगुल मिलाकर कुक्कुपुट देनी चाहिये । द्वितीय पुट में केवल हिंगुल ही समभाग डालकर पुट देना चाहिये । पहिले पुट से ही स्वर्ण चूर्ण रूप में हो जायगा, उसको न तो फिर पिघलाने की ही आवश्यकता है और न पारदभस्म ही मिलाने की । यहाँ पर केवल पारद के योग से स्वर्ण- भस्मविधि लिखने से यह स्मरण कराया है कि धातुओं का पारदभस्म के सहयोग से भस्म करना सर्वोत्तम होता है—"लोहानां मारणं श्रेष्ठं सर्वेषां रसभस्मना । मध्यमं मूलिभिः प्रोक्तमधमं गन्धकादिभिः ॥” द्वितीयो मारणप्रकारः विशुद्धस्वर्णपत्राणि कर्षैकप्रमितानि च । समादाय समं सूतं दत्त्वा संमर्दयेद् दृढम् ॥४९॥ निम्बुद्रावेण सम्पेष्य सम्यक् प्रक्षालयेत्ततः । हिंगुलं गन्धकञ्चाथ शिलाञ्च नवसादरम् ॥५०॥ पृथक् पृथक् कर्षमितं निक्षिप्ताम्लेन मर्दयेत् । संशोष्य चातपे सम्यक् श्लक्ष्णचूर्णंञ्च कारयेत् ॥५१॥ पुटेत्तावत्प्रयत्नेन यावन्निश्चन्द्रिकं भवेत् । इत्थं स्वल्पपुटैरेव काञ्चनं याति पञ्चताम् ॥५२॥ अपरः प्रकारः—सूतं हिंगुलोत्थं शोधितं वा, प्रक्षालनञ्च वर्णोज्ज्वलतार- क्षार्थम् । अत्र च प्रतिवारं पारदादीनां क्षेपः । पुटनञ्च लघुपुटैनैव । स्वल्पपुटैः यथासम्भवं सप्तभिः । निश्चन्द्रिकञ्च भस्मलक्षणम् ॥ ४९-५२ ॥ भा.टी.—एक कर्ष परिमाण में शुद्ध स्वर्ण पत्र लेकर खरल में डालें और उसमें एक कर्ष शुद्ध पारद डालकर दोनों को मर्दन करें । फिर नींबू के रस से मर्दनकर अन्त में अच्छी तरह धो लेवें । अब इस स्वर्ण में शुद्ध हिंगुल, शुद्ध गन्धक, शुद्ध मैनसिल, नौसादर प्रत्येक एक कर्ष मिला बिजौरानींबू के रस से

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक) · पृष्ठ 398, कुल 799 में से · BharatKosha