भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पञ्चदशस्तरङ्गः ३७५ श्रीमत्परमपूज्येन धन्वन्तरिमहर्षिणा। भिषग्हिताय सुगमः प्रकारोऽयं निरूपितः ॥ ६८ ॥ पञ्चमो मारणप्रकारः—श्वेतपाषाण “सङ्गमर्मर” इति ख्यातम्, अत्र श्वेत- पाषाणस्यैकवारं क्षेपः । प्रतिवारन्तु पारदगन्धकयोरिति विशेषतः । श्रीमत्परम- पूज्येनेति सम्प्रदायनिर्देश आदरार्थम् । व्याख्यासमानमन्यत् ॥ ६२–६८ ॥ भा.टी.—विशुद्धस्वर्ण के सूचीवेध्य पत्रों को खरल में डाल उसमें समभाग शुद्धपारद मिला तीन दिन तक नींबू के रस में मर्दन करके जल से अच्छी तरह धो लेवें। अब इसमें सोने से आधा भाग पूर्वोक्त श्वेतपाषाण का चूर्ण मिला जम्भीरीनींबू के रस में तीन दिन तक मर्दन करके द्रवभाग को सुखाकर चूर्ण कर लें। अब इस चूर्ण में स्वर्ण के बराबर भाग शुद्धगन्धकचूर्ण मिला लघुसम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक दें। इस प्रकार तब तक लघुपुट में फूँकते रहें जब तक स्वर्ण की चन्द्रिका रहित भस्म न हो जाय। निश्चन्द्र भस्म होने पर इस भस्म को कचनार की छाल के स्वरस से भावना देकर फिर लघुपुट में फूँकें। इस प्रकार कचनार के स्वरस की भावना देकर तीन पुट दें। इस विधि से बनी हुई स्वर्ण भस्म पके हुए जामुन के रंग की होती है। स्वर्णभस्म बनाने की यह सरल विधि है ॥ ६२–६८ ॥ वक्तव्य—उक्त पञ्चम मारण प्रकार से श्वेतपाषाण ( संगमरमर ) चूर्ण पहिले एक बार ही डालना चाहिये; दूसरे पुटों में नहीं। यह आधा भाग श्वेत पाषाणचूर्ण निश्चन्द्रभस्म करने तक प्रायः उड़ जाता है या दग्ध होकर किञ्चित् क्षार रूप में अवशिष्ट रहता है। मृतसुवर्णस्य गुणाः मृतं सुवर्णं मधुरञ्च वृष्यं हृद्यञ्च नेत्र्यं परमञ्च मेध्यम् । रसायनं पुंसवनोपयोगि विषापहं कान्तिकरञ्च शस्तम् ॥ ६९ ॥ अथ मृतसुवर्णगुणाः—पुंसवनोपयोगि गर्भिण्याः पुंसवनकार्यकरम् ॥ ६९ ॥ भा.टी.—स्वर्णभस्म स्वाद में मधुर, बलवर्धक, हृदय और नेत्रों के लिये सर्वोत्तम बलकारी है। मेधाशक्ति के लिये भी यह सर्वोत्तम होती है। सर्व शरीर के लिये पोषक होने तथा त्रिदोषप्रकोपशामक होने से रसायन, पुंसवनसंस्कार के लिये अत्यन्त उपयोगी है। शरीरगत सब विषों का नाशक और शरीर की कान्तिवर्धक होती है ।।। ६९ ॥ अपि च स्वर्णं स्निग्धं मधुरमधुरं वृष्यमायुष्यमग्र्यं