रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८४ रस्तरङ्गिणी स्वर्ण का सेवन करने से मनुष्य का जीवन स्थिर तथा दुःख रहित होता है। नागकेसरचूर्ण में स्वर्णभस्म मिलाकर ऋतुकाल में स्त्री को सेवन कराने से उसके गर्भाशय में गर्भधारण शक्ति बढ़ जाती या उत्पन्न हो जाती है। काकोल्यादिग- णोक्त (काकोली, क्षीरकाकोली, मुलेठी, काकड़सिंगी, मेदा, महामेदा, जीवक, ऋषभक, प्रपौण्डरिक, मुनक्का, ऋद्धि, वृद्धि, वंशलोचन, शालपर्णी, विदारी- कन्द, पद्माख, गुडूची) औषधियों में से जितनी मिल सकें उनके चूर्ण के साथ स्वर्णभस्म सेवन करने से स्त्री के स्तनों में दुग्ध की वृद्धि होती है। विभिन्न गुण युक्त द्रव्यों के एकत्र प्रयोग से उत्पन्न विषबाधा को दूर करने के लिये स्वर्णभस्म को स्वर्णमाक्षिकभस्म और खाँड के चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करने से आराम आता है। साधारण विषबाधा को दूर करने के लिये स्वर्णभस्म को निर्विषीचूर्ण में मिलाकर सेवन किया जाता है। त्रिदोषप्रकोपजन्य हिक्का (हिचकी) को शान्त करने के लिए स्वर्णभस्म को पाढल के फलरस और शहद में मिला कर सेवन करने से शीघ्र ही हिक्का शान्त हो जाती है। अस्थिशोथ तथा अस्थि- क्षत में स्वर्णभस्म को खाँडचूर्ण के साथ सेवन करने से आराम आता है। खाँड के साथ स्वर्ण सेवन से दूध पीनेवाले बच्चों की अस्थिवक्रता (हड्डी का टेढ़ा होना—( Rickels ) तथा भयंकर अस्थिपीड़ा निश्चित ही शीघ्र नष्ट हो जाती है। शीर्ष (सिर) देश में फैले हुए (कुपित) प्रसादसंज्ञक वायु को शान्त करने के लिये स्वर्णभस्म एक भाग, अभ्रकभस्म तीन भाग, लौहभस्म तीन भाग लेकर तीनों को एक करके उचितमात्रा में लेकर वरणाकषाय या स्वरस के साथ सेवन करने से दाह तथा शोथयुक्त वृक्करोग शान्त हो जाता है। गर्भाशय में अनेक उपद्रवयुक्त शोथ को दूर करने के लिये स्वर्णभस्म को शिलाजीत, लोह- भस्म और रजतभस्म में मिलाकर दशमूलकषाय अनुपान से सेवन करने पर शीघ्र आराम आता है। उदरप्रदेश में प्रकुपित मल-मूत्र वायु को शीघ्र शान्त करने के लिये स्वर्णभस्म को अभ्रकभस्म तथा लोहभस्म के साथ सेवन करना चाहिये। स्वर्णभस्म में हरिद्राचूर्ण तथा पुनर्नवाचूर्ण मिलाकर अदरखरस के साथ प्रयोग करने से अण्डकोषों की सूजन कुछ काल में ही मिट जाती है ॥ ८२–११६ ॥ वक्तव्य—हृदयरोग की निर्बलता से स्वर्णभस्म या स्वर्णपत्रों को आम- लकीस्वरस अथवा अर्जुन तथा आमलकीकषाय या क्षीरपाक के साथ प्रतिदिन कुछ काल सेवन कराना चाहिये। उन्माद, अपस्मार, योषापस्मार आदि