भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पञ्चदशस्तरङ्गः ३८३ चीनीचूर्ण में मिलाकर सेवन करने से आराम आता है । पुराने फिरंग को नष्ट करने के लिये स्वर्णभस्म में रसपुष्प मिलाकर इसको रक्तशोधक, गुडूची, केसर, अनन्तमूल आदि वनौषधियों के कषाय के साथ सेवन करना चाहिये । चरकोक्त श्वासहर शटीचूर्ण आदि द्रव्यों के साथ स्वर्णभस्म सेवन करने से भयंकर श्वास्रोग नष्ट होता है । नूतन अथवा पुरातन साधारण या भयंकर प्रकार के अम्लपित्त रोग में स्वर्णभस्म को आँवलों के चूर्ण में मिलाकर सेवन करना चाहिये । अपस्मार तथा याँपापस्मार में स्वर्णभस्म को रससिन्दूर, अभ्रकभस्म तथा शंखपुष्पीचूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करने से शीघ्र आराम आता है । शिरःकम्परोग में स्वर्णभस्म को बला-( खरेंटी )-क्वाथ के साथ सेवन किया जाता है । स्वर्णभस्म में पारद गन्धक की समभाग कज्जली और पुनर्नवाचूर्ण मिलाकर गोमूत्र अनुपान से सेवन करने पर अण्डकोष में होने- वाली सूजन मिट जाती है । स्वर्णभस्म को मुनक्का, पिप्पलीचूर्ण, कट्फलचूर्ण तथा मुलेठीचूर्ण में मिलाकर कुछ काल सेवन करने से कण्ठस्वर इतना कोमल और सुरीला हो जाता है कि इसके सामने मदमस्त कोयल का शब्द भी फीका पड़ जाता है । लालचन्दन, नागकेसर अथवा कमलकेसर, नीलोफर, मुलेठी, खाँड़, मंजीठ, केसर आदि रक्तशोधक तथा रक्तवर्धक द्रव्यों के साथ स्वर्णभस्म सेवन से स्त्रियों में सुंदरता की वृद्धि होती है । त्रिदोषप्रकोपजन्य उन्माद रोग में स्वर्णभस्म को सोंठ, लौंग और कालीमिर्च मिलाकर शहद के साथ सेवन करने से आराम आता है । किसी तीव्र रोग के कारण जीवन अन्त होने का भय उप- स्थित होने पर अर्थात् मरणचिह्न ज्ञात होने पर अथवा बुढ़ापे में इस (स्वर्ण) को आमला की चूर्ण में मिला खदिरत्वक्क्वाथ की भावना देकर सेवन करने से अरिष्टचिह्न नष्ट हो जाते हैं । स्वर्णभस्म को वच, गिलोय, सोंठ तथा शता- वरचूर्ण के साथ छः मास तक निरन्तर सेवन करने से मेधा शक्ति ( धारणा- शक्ति ) में वृद्धि होती है । स्वर्णभस्म को शालपर्णी, विदारीकन्द, असगन्ध और कौंचबीजचूर्ण के साथ तीन मास तक निरन्तर सेवन करने से कृश शरीर वाले मनुष्य हृष्टपुष्ट शरीर तथा सन्तानोत्पादन में समर्थ बन जाते हैं । आम- लकी, शालपर्णी, सोंठ तथा पुनर्नवाचूर्ण अथवा इनके कषाय से स्वर्णभस्म सेवन करने से मनुष्य अधिक बलवान् तथा देखने में युवा और सुन्दर स्वरूप हो जाता है । जीवनीद्रणोक्त (काकोली, क्षीरकाकोली, मेदा, महामेदा, जीवक, ऋषभक, ऋद्धि, वृद्धि, मुलेठी, जीवन्ती, मूँगपर्णी, माषपर्णी) औषधियों के साथ